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आज फिर दर्द छलका:-मोहित मुक्त

आज फिर दर्द छलका।
आँख फिर आज रोयी।
प्रिये, दिल ने फिर से-
स्मृतियाँ संजोई।

शिशिर रात में वह-
प्रणय के मधुर क्षण।
चांदनी की चादर पर -
हम और तुहिन-कण।
नर्म लबों पर-
पीयूष सा वो पानी।
हौले हवा में -
वो घुलती जवानी।
पल पास हैं सब-
तुम हीं हो खोयी।
आज फिर दर्द छलका।
आँख फिर आज रोयी।


शलभ बन जला मैं,
शिखा प्यार की थी।
बात इच्छाओं के,
बस सत्कार की थी।
जुदा मोड़ पर ,
आज दोनों खड़े हैं।
गम के कड़े शूल ,
दिल में गड़े हैं।
आँसू से तुमने-
भी आँखे भिगोई।
आज फिर दर्द छलका।
आँख फिर आज रोयी।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Mohit mishra (mukt) on November 23, 2017 at 11:05pm

आदरणीय डॉ. साहब  नमन, आपके स्नेहाशीष के लिए कोटिशः धन्यवाद 

Comment by Mohit mishra (mukt) on November 23, 2017 at 11:05pm

आदरणीय विजय सर , आपसे उत्साहवर्धन सौभाग्य की बात है। बहुत बहुत धन्यवाद 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 23, 2017 at 8:12pm

कविता पर मोहित हूँ प्रिय

Comment by vijay nikore on November 23, 2017 at 11:35am

अच्छी कविता के लिए बधाई।

Comment by Mohit mishra (mukt) on November 21, 2017 at 5:50pm

आदरणीय आरिफ साहब, आपको रचना पसंद आयी यह मेरा सौभाग्य है।  शुक्रिया 

Comment by Mohit mishra (mukt) on November 21, 2017 at 5:49pm

आदरणीय सुरेंद्र सर, रचना को सम्मान देने का शुक्रिया 

Comment by Mohammed Arif on November 21, 2017 at 12:17pm
आदरणीय मोहित मुक्त जी आदाब,
बहुत अच्छा दर्द छलकाया आपने । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on November 20, 2017 at 9:50pm
आद0 मोहित जी सादर अभिवादन, बढ़िया रचना लिखी आपने, हार्दिक बधाई आपको इस प्रस्तुति पर।
Comment by Samar kabeer on November 20, 2017 at 9:06pm
मेरी बात को मान देने के लिए धन्यवाद,इस त्रुटि को दुरुस्त कर लीजियेग ।
Comment by Mohit mishra (mukt) on November 20, 2017 at 7:22pm

आदरणीय लक्ष्मण जी कविता पर उपस्थिति का बहुत बहुत शुक्रिया 

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