For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल: अंगारो से प्रीत निभाया करता हूँ

22 22 22 22 22 2
अंगारो से प्रीत निभाया करता हूँ ।
ख्वाब जलाकर रोज़ उजाला करता हूँ।।

एक झलक की ख्वाहिश लेकर मुद्दत से ।
मैं बादल में चांद निहारा करता हूँ ।।

एक लहर आती है सब बह जाता है ।
रेत पे जब जब महल बनाया करता हूँ ।।

शेर मेरे आबाद हुए एहसान तेरा ।
मैं ग़ज़लों में अक्स उतारा करता हूँ ।।


दर्द कहीं जाहिर न हो जाये मुझसे ।
हंस कर ग़म का राज छुपाया करता हूँ ।।

पूछ न मुझसे आज मुहब्बत की बातें ।
याद में तेरे वक्त गुजारा करता हूँ ।।

सब कुछ सुनकर बात वही वो टाल रहा ।
जिन बातों पर रोज इशारा करता हूँ ।।


फिर रिश्तों के बीच मिली हैं दीवारें ।
जिनको मैं दिन रात गिराया करता हूँ।।

मेरी उल्फ़त पर हँसते हैं लोग यहां ।
आसमान की हसरत पाला करता हूं ।।

अक्सर नंगे हो जाते हैं पाव मेरे ।
जब चादर से पांव निकाला करता हूँ ।।

तूफानों में साथ छोड़ उड़ जाएंगे ।
जिन पत्तों के साथ बसेरा करता हूँ ।।

-- नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

Views: 920

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 11, 2017 at 2:26pm

आदरणीय नवीन जी हर शेर उम्दा है कमाल की इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई सादर 

Comment by Naveen Mani Tripathi on November 8, 2017 at 10:26pm
आ0 अफरोज सहर साब शुक्रिया
Comment by Naveen Mani Tripathi on November 8, 2017 at 10:26pm
आ0 गुरुदेव कबीर साहब सादर नमन के साथ आभार ।
Comment by Samar kabeer on November 8, 2017 at 9:23pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
'याद में तेरे वक़्त गुज़ारा करता हूँ'
इस मिसरे में 'तेरे'की जगह "तेरी"करना उचित होगा ।
'तूफ़ानों में साथ छोड़ उड़ जाएंगे'
ये मिसरा लय में नहीं है,इसे यूँ कर सकते हैं :-
'साथ न देंगे तूफ़ां में,उड़ जाएंगे'
Comment by Afroz 'sahr' on November 8, 2017 at 5:48pm
"एक लहर आती है तो बह जाता है"
वो महल जो रेत पे मैं बनाया करता हूँ। यूँ कहिएगा,,,,
Comment by Afroz 'sahr' on November 8, 2017 at 5:24pm
आदरणीय नवीन मणि जीआदाब "रेतों पर जब महल बनाया करता हूँ" में लफ़्ज़ " रेतों" का प्रयोग उचित नहीं है क्यूँ की
लफ़्ज़ "रेत" स्वंय ही बहुवचन होता है। लफ़्ज़ "महल" का वज़्न "12" होता है ना की "21" अत: "महल" की तक़्तीअ "12" वज़्न के मुताबिक कीजिएगा,, सादर,,
Comment by Naveen Mani Tripathi on November 8, 2017 at 12:48pm
आ0 मुहम्मद आरिफ साहब शुक्रिया ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on November 8, 2017 at 12:46pm
आ0 अफ़रोज़ सहर साहब विशेष आभार । एक लहर आती है तो बह जाता है । रेतों पर जब महल बनाया करता हूँ।। अब देखिए सर ।
Comment by narendrasinh chauhan on November 8, 2017 at 9:34am

खूब सुन्दर रचना 

Comment by Mohammed Arif on November 8, 2017 at 8:11am
आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, बहुत ही प्यारी ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें । आदरणीय अफरोज़ सहर जी की बातों से मैं सहमत हूँ ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

*दोहा*बरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।।*चौपाई*वह फुहार वह साथ…See More
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Tuesday
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Tuesday
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Saturday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Jul 10
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Jul 9
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Jul 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service