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मधु-मीतों का व्यक्तिवाद (लघुकथा)/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"धर्मों, महात्माओं की गरिमा की तो धज्जियां उड़ रही हैं! कितने पवित्र नाम कैसी-कैसी मानसिकताओं के साथ जुड़ गए!"
"नयी पीढ़ी है, उसकी अपनी सोच विकसित हुई है वैश्वीकरण और इंटरनेट के दौर में!"
"क्या यही है जीवन जीने की कला? यह कैसा विकृत रूप है धर्मों, धर्मावलंबियों और विपश्यना जैसी साधनाओं का?!"
"बाबाओं ने पाश्चात्य रंग दे डाले हैं... और कट्टरपंथियों ने आतंक के!"
घटनाओं और हालात पर कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी बेबाक चर्चा कर रहे थे। अधिकतर उनकी बुराई कर रहे थे, जबकि उनमें से कुछ प्रशंसा। कुछ तो चर्चित धार्मिक नामों और साधनाओं की अपनी-अपनी तरह से व्याख्यायें करते हुए ऐसे नामधारियों के ताज़े 'योग' पर व्यंग्य कर रहे थे :
"मधु से प्रीत किसे नहीं है? धन-दौलत, सुख-सुविधाओं, ऐश-ऐश्वर्य और सत्ता की मधु कौन चखना नहीं चाहेगा?"
"बिल्कुल सही कहा आपने। कौन नहीं चाहेगा ये सब शॉर्टकट्स से हासिल करना.... और इसके लिए 'गुरुओं' की ज़रूरत तो होगी ही!"
"सही कहा आपने। नीतियां कारगर न हों; सच्चे शिक्षक और धर्मगुरू समय पर अपने फ़र्ज़ न निभायें; तो ऐसे ही तो गुरू और उनके ऐसे ही मीत पनपेगें न!"- एक शिक्षक ने कहा।
"हमारी कमज़ोरियों का फ़ायदा देशद्रोही और विदेशी सब उठा रहे हैं, मुझे तो कोई अंतरराष्ट्रीय साज़िश लगती है हमारी संस्कृति और संस्कार मिटाने की!"- एक विश्लेषक ने कहा
"भाईसाहब, जब लोकतंत्र और धर्म की आड़ में देश के ही नेता, रक्षक और सत्ता भी अपने स्वार्थ साधेगी और जनता उल्लू बनेगी, तो ऐसे ही व्यक्तिवाद, ऐसे ही षड़यंत्रों और ऐसे ही डेरों के योग बनेंगे न!"- एक देशभक्त बुज़ुर्ग ने अपना माथा पीटते हुए कहा।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 20, 2017 at 11:58am
रचना पर समय देकर अनुमोदन , समीक्षात्मक टिप्पणी और हौसला अफज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब डॉ. आशुतोष मिश्रा साहब।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 19, 2017 at 9:55pm
आदरणीय शेख शहजाद उस्मानी जी आपकी इस रचना में चिंतन जा पूरा साजो सामान है जागरूक करती उस शानदार रचना के साथ दिवाली के इस पर्व पर समाज में ब्याप्त अँधेरे को मिटाने का प्रयास करती इस रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर।।।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 19, 2017 at 4:17pm
इस रचना पर समय देकर अनुमोदन व हौसला अफज़ाई के लिए सादर हार्दिक धन्यवाद आदरणीय विनय कुमार जी, जनाब समर कबीर साहब और जनाब सलीम रज़ा रीवा साहब।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 19, 2017 at 4:16pm
रचना पर त्वरित समीक्षात्मक प्रोत्साहक टिप्पणी के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहब। दीपोत्सव पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।
Comment by SALIM RAZA REWA on October 19, 2017 at 9:43am
वाह आ. ख़ूबसूरत लघुकथा के लिए मुबारक़बाद.
Comment by Samar kabeer on October 18, 2017 at 2:40pm
जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,बहुत उम्दा लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by विनय कुमार on October 18, 2017 at 11:34am

वर्तमान परिस्थितियों पर बढ़िया तंज कस्ती रचना के लिए बहुत बहुत बधाई आ शेख शहज़ाद साहब

Comment by Mohammed Arif on October 17, 2017 at 4:57pm
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,बहुत ही कटाक्षपूर्ण, सामयिक विषय को लघुकथा का आधार प्रदान करती, वर्तमान में उजागर हुए चरित्रों का पर्दाफाश करती लघुकथा । सच भी है, यदि समाज में दुष्चरित्र उजागर होंगे तो निश्चित रूप से लघुकथा के कथानक बनेंगे ही और बनना भी चाहिए । बहुत-बहुत बधाई । शीर्षक के ऊपर थोड़ा विचार करें ।

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