For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

अजनबी इस भीड़ में ढूँढे किसे मेरी नजर (ग़ज़ल 'राज')

2122  2122  2122  212

 

जिंदगी की जुस्तज़ू में आ गई जाने किधर 
अजनबी इस भीड़ में ढूँढे किसे मेरी नजर 

बे-नियाज़ी की यहाँ दीवार कैसे आ गई 
'हम नफ़स अह्ल-ए-महब्बत कुछ इधर हैं कुछ उधर 

साथ साया भी रहेगा जब तलक है रोशनी 
कौन किसका साथ देता बेवजह यूँ उम्रभर 

लौट कर आती नहीं ये खूब जीले जिंदगी 
इक सितारा कह गया यूँ आसमां से टूटकर 

खींच लाई झोंपड़ी को जब महल की रोटियाँ 
एक दिन आकर अना ने ये कहा जा डूब मर 

कोई सीढ़ी भी नहीं है और खाली जेब है 
डिग्रियाँ हाथों में लेकर फिर रहा वो दरबदर 

दूर कितनी मेरी मंजिल कब मिलेगी क्या पता 
जीस्त की जद्दोजहद में खो गई है रहगुज़र

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 849

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by राज़ नवादवी on October 8, 2017 at 4:16pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी, उम्दा ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें. सादर 

Comment by नाथ सोनांचली on October 8, 2017 at 7:56am
आदरणीया बहन राजेश कुमारी जी सादर अभिवादन, बहुत ही प्यारी ग़ज़ल । बेहतरीन अश'आर । शैर दर शैर दिली मुबारकबाद क़बूल करें ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 7, 2017 at 12:37pm

आद० सलीम रजा भैया ,ग़ज़ल पर शिरकत और सुखन नवाजी का तहे दिल से शुक्रिया |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 7, 2017 at 12:36pm

आद० मोहम्मद आरिफ जी ,ग़ज़ल पर शिरकत और सुखन नवाजी का तहे दिल से शुक्रिया |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 7, 2017 at 12:34pm

आद० बृजेश कुमार जी ,आपका बहुत बहुत शुक्रिया .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 7, 2017 at 12:33pm

आद० अफ़रोज साहब ,आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका बहुत- बहुत शुक्रिया| 

Comment by SALIM RAZA REWA on October 6, 2017 at 10:18pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी आदाब,

बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

...........दीदी मेरी ग़ज़लों  को  भी आपकी महब्बत  से नवाज़ें ,

Comment by Mohammed Arif on October 6, 2017 at 8:34pm
आदरणीया राजेश कुमारी जी आदाब, बहुत ही प्यारी ग़ज़ल । बेहतरीन अश'आर । दिली मुबारकबाद क़बूल करें ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 6, 2017 at 3:33pm
बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई आदरणीया..सादर
Comment by Afroz 'sahr' on October 5, 2017 at 4:11pm
मोहतरमा राजेश कुमारी साहिबा आदाब बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने शेर दर शेर दाद ,,,अनलिमिटेड,, कुबूल करें सादर,,,,,,,

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"  आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद' जी सादर नमस्कार, रास्तो पर तीरगी...ये वही रास्ते हैं जिन…"
6 hours ago
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
Tuesday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183

आदरणीय साहित्य प्रेमियो, जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। संयोग शृंगार पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।। प्रेम लोक की कल्पना,…See More
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
Feb 7
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 6
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Feb 5
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Feb 5
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Feb 5
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 4
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Feb 4

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service