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दबी हर बात जिंदा क्यूँ करें हम (ग़ज़ल)

बह्र -मुफाईलुन मुफाईलुन फ़ऊलुन

तुम्हारा राज़ इफ़शा क्यूँ करें हम|
दबी हर बात जिन्दा क्यूँ करें हम||

न हो जो भाग्य को यारों गवारा,
फिर उसकी ही तमन्ना क्यूँ करें हम||

जगाती दर्द हो जो बात दिल में,
उसी का रोज चर्चा क्यूँ करें हम||

लगा दे आग जो सारे जहाँ में ,
कोई भी ऐसी रचना क्यूँ करें हम||

जिसे करके रहे अफ़सोस मन में,
कोई भी काम ऐसा क्यूँ करें हम||

बहन माँ बेटियाँ तुहफ़ा ख़ुदा का,
उन्ही पे कोई हिंसा क्यूँ करें हम||

बमुश्किल चार दिन की ज़िंदगी में,
महब्बत छोड़ झगड़ा क्यूँ करें हम||

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Samar kabeer on September 19, 2017 at 11:45am
जनाब तस्दीक़ साहिब सही शब्द "महब्बत"ही है, लुग़ात देख लें ।
Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 19, 2017 at 9:53am

वाह , शानदार अशआर, आपको बहुत बहुत बधाई 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on September 19, 2017 at 9:40am
जनाब सुरेन्द्र नाथ साहिब ,उम्दा ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं। आखरी शेर में महब्बत को मुहब्बत कर लें
Comment by Mohammed Arif on September 19, 2017 at 9:15am
आदरणीय सुरेंद्रनाथक्षजी आदाब, बेहतरीन ग़ज़ल । हर शे'र लाजवाब । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें ।
Comment by नाथ सोनांचली on September 19, 2017 at 4:27am
आद0 अफरोज जी आपका शुक्रिया
Comment by नाथ सोनांचली on September 18, 2017 at 5:29pm
आद0 समर कबीर साहब सादर प्रणाम, ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और दाद का शुक्रिया, बहुत बहुत आभार।
Comment by Afroz 'sahr' on September 18, 2017 at 4:16pm
आदरणीय समर साहब ""तुहफ़ा"" स्वीकार्य सादर,,,,,
Comment by Samar kabeer on September 18, 2017 at 3:31pm
सही शब्द 'तोहफ़ा' नहीं "तुहफ़ा"वज़्न 22
Comment by Samar kabeer on September 18, 2017 at 3:01pm
जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by नाथ सोनांचली on September 18, 2017 at 1:06pm
आद0 सलीम भाई जी सादर अभिवादन, ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और उत्साहवर्धन का बहुत बहुत आभार।

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