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भोर होने से पहले ...

भोर होने से पहले ...

वाह
कितनी अज़ीब
बात है
सौदा हो गया
महक का
गुल खिलने से
पहले

सज गयी सेजें
सौदागरों की आँखों में
शब् घिरने से
पहले

बट गया
जिस्म
टुकड़ों में
हैवानियत की
चौख़ट पर
भर गए ख़ार
गुलशन के दामन में
बहार आने से
पहले

वाह
इंसानियत के लिबास में
हैवानियत
कहकहे लगाती है
ज़िंदगी
दलालों की मंडी में
रोज मरती है
जीने की
भोर होने से
पहले

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 942

Comment

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Comment by Sushil Sarna on September 4, 2017 at 4:07pm

आदरणीय फूल सिंह जी सृजन पर आपकी मधुर प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on September 4, 2017 at 4:07pm

आदरणीय महेन्द्र कुमार जी सृजन आपकी मन मुदित करती प्रशंसा का आभारी है। 

Comment by Sushil Sarna on September 4, 2017 at 4:06pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी भाई साहिब सृजन के भावों अपनी आत्मीय स्वीकृति देती प्रतिक्रिया का दिल से आभार। 

Comment by Sushil Sarna on September 4, 2017 at 4:06pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on September 4, 2017 at 4:06pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब ... प्रस्तुति को अपनी सहमति देती प्रशंसात्मक प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया।

Comment by Sushil Sarna on September 4, 2017 at 4:01pm

आदरणीय मो.आरिफ साहिब, आदाब। .. सृजन के भावों पर आपकी मधुर प्रशंसा का हार्दिक आभार।

Comment by PHOOL SINGH on September 4, 2017 at 3:03pm

बहुत ही सुंदर, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Mahendra Kumar on September 3, 2017 at 1:27pm

आ. सुशील सरना जी. बहुत ही सशक्त कविता प्रस्तुत की है आपने. मेरी तरफ़ से हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2017 at 6:31pm

आदरनीय सुशील भाई , कुछ सोचने को बाद्ध्य करती है ये कविता ... बहुत खूब , हार्दिक बधाई ।

Comment by नाथ सोनांचली on September 2, 2017 at 5:47am
आद0 सुशील सरना जी बहुत ही उम्दा, सोचने को बार बार विवश करती रचना। बधाई इस सृजन पर

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