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आल्हा (वीर छंद) पर प्रथम प्रयास

लाख करूँ मैं कोशिश फिर भी, कभी न लिख पाऊँ श्रृंगार|
कलम उठाऊँ लिखने को जब, शब्दो में बरसे अंगार||
गीत तराने जब जब सोचू, दिख जाते बेबस लाचार|
छन्द ग़ज़ल तब मुझे चिढ़ाते, हिय में उठता हाहाकार||

बोल चाल के शब्द चुनूँ मैं, उन शब्दो से करू धमाल|
नही जमीर बिकाऊँ मेरा सत्ता का मै नही दलाल||
निडर भाव से सत्य लिखू मैं, करूँ झूठ को सदा हलाल|
अगर किसी ने आँख दिखाई, पल में लू मैं आँख निकाल||

भावों में तब ज्वाला भड़के, जब देखूँ बेहाल किसान||
अन्न उगाकर जो बेचारा, सहता घृणा और अपमान||
ब्याहन योग्य हुई जब बेटी, गिरवी रखे खेत खलिहान|
मिले नहीं जब उसे सहारा, दे देता फिर अपनी जान||

लिपट लाश से बच्चे रोते, बिदिया रो रो करे गुहार|
घर मे पड़ीं जवान बेटियाँ, किस विधि होंगा बेड़ा पार||
बोझ कर्ज का सहते सहते, चला गया अब पालन हार|
छलक पड़े आँखों में आँसू, भरे लेखनी तब हुंकार||

क्यों असमय है माँग उजड़ती? मरता कोई माँ का लाल|
बात ग़रीबो की सब करते, क्यों फिर ऐसा उनका हाल?
खून पसीना एक करे जो, जीवन उसका क्यों बदहाल?
भूख ग़रीबी अब तक क्यों है? कलम करें अनबूझ सवाल||

एक तरफ हैं बच्चे मरते, एक तरफ सोती सरकार|
मूक बधिर है शासन अपना, सुने नहीं उनकी चीत्कार||
कभी दामिनी कभी निर्भया, चीख चीख कर करे पुकार|
नाथ लिखो तुम हालत सच्ची, हिल जाए सारा संसार||

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on September 6, 2017 at 7:23am

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह जी सादर, वीर छंद पर आपका यह प्रयास बहुत उत्तम हुआ है. प्रथम प्रयास में ही आपने छह छंद रच दिए है. बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें. //नही जमीर बिकाऊँ मेरा// इस चरण में गेयता के अतिरिक्त वर्तनी की अशुद्धियों पर अवश्य ध्यान दें.

शब्दो/शब्दों ,करू/करूँ,लू/लूँ........सादर.,

Comment by नाथ सोनांचली on August 30, 2017 at 1:14pm
आद0 गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी
Comment by नाथ सोनांचली on August 30, 2017 at 1:13pm
आद0 गोपक नारायण जी सादर अभिवादन, रचना पर उपस्थित होकर उत्साहवर्धन के लिए सादर आभार।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 30, 2017 at 1:07pm

सुने नहीं उनकी चीत्कार||   मात्रा 15 होने पर  भी रिदम बाधित करता है चीत्कार . ऐसे शब्दों से बचना चाहिए , आपका प्रथम प्रयास है तो आपने बहुत अच्छी रचना की  है . आपको बधाई . 

Comment by नाथ सोनांचली on August 29, 2017 at 3:00pm
आद0 कल्पना भट्ट जी सादर अभिवादन, रचना पर आपकी उपस्थिति नया उत्साह जगाती है। रचना पसन्द करने के लिए आभार
Comment by नाथ सोनांचली on August 29, 2017 at 2:59pm
आद0 समर साहब सादर प्रणाम, आपने सराहना पाकर लिखना सार्थक हो गया। उत्साहवर्धन के लिए हृदय से आभार आपका।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 29, 2017 at 1:06pm

बहुत सुंदर सृजन , हार्दिक बधाई आदरणीय |

Comment by Samar kabeer on August 29, 2017 at 12:44pm
जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,आपका प्रथम प्रयास कामयाब रहा,बहुत उम्दा छन्द लिखे आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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