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सियासत मुल्क़ की यारों लहू पीने की आदी है
निवाला छीन भूखों का पहनती आज खादी है
किसे अच्छा कहूँ मैं अब सभी का हाल इक जैसा
बना है रहनुमा वो आज जो खुद ही फ़सादी है |1|

अगरचे दिल सियासत से बहुत नाशाद है अपना
नहीं लगता दयार-ए-हिन्द ये आबाद है अपना
उठेगी गर वतन में अब किसी निर्दोष की मय्यत
कहेगा कौन किस मुंह से वतन आज़ाद है अपना |2|

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by नाथ सोनांचली on August 22, 2017 at 4:34pm
आद0 समर कबीर साहब सादर प्रणाम, प्रोत्साहन के लिए आभार
Comment by Samar kabeer on August 21, 2017 at 6:31pm
जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,अच्छे मुक्तक लिखे आपने,बधाई स्वीकार करें ।
पहले मुक्तक की पहली पंक्ति में 'लहूँ'को "लहू" कर लें ।
Comment by नाथ सोनांचली on August 21, 2017 at 12:59pm
आद0 विजय निकोर जी सादर अभिवादन, प्रोत्साहन के लिए आभार
Comment by vijay nikore on August 21, 2017 at 9:47am

अच्छे मुक्तक के लिए बधाई, सुरेन्द्र जी

Comment by नाथ सोनांचली on August 21, 2017 at 5:19am
आद0 लक्ष्मण धामी जी आपको मुक्तक अच्छे लगे, लिखना सार्थक हुआ। आभार आपका।
Comment by नाथ सोनांचली on August 21, 2017 at 5:17am
आद0 मोहित मिश्रा जी मुक्तक पसंद आये, लेखन सार्थक हुआ, आभार
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 20, 2017 at 9:12pm
आ. भाई सुरेन्द्र जी सुंदर मुक्तक हुए हैं हर्दिक बधाई ।
Comment by नाथ सोनांचली on August 20, 2017 at 3:27pm
आद0 भाई मोहम्मद आरिफ जी सादर अभिवादन, आपकी प्रतिक्रिया पाकर आश्वस्त हुआ, लेखन सार्थक लगने लगा। आभार आपका
Comment by Mohammed Arif on August 20, 2017 at 10:20am
आदरणीय सुरेंद्र जी आदाब, सियासत के चरित्र को उजागर करते बेहतरीन मुक्तक । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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