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प्रेयसी के संग कल्पना के पल :- मोहित मुक्त

आओ सुनाता हूँ तुम्हें एक कहानी,
वो जो है मेरे सपनों की रानी,
मदमस्त अल्हड़ नवयौवना है,
बस इतना जानो वो मेरी कल्पना है|

जी करता है बन के मैं पायल,
 नाचूँ प्यारी के साथ सुधि विसरा के,
बन के लाली उसके होठों पे छा जाऊं मैं,
या बन काजल बसूँ उसके आँखों में जाके|

सरसो के पीले खेतों में वो ,
ले अंगड़ाई और मै उसको निहारूं,
थोड़ा शरमा के देखे थोड़ा मुस्कुराए ,
वो मुझपे और मै उसपे वारी जाऊं |

नदी का किनारा हो और उसका साथ हो,
मेरे हाथों में... उसका हाथ हो ,
वो लेटे और गोद मेरी हो ,
शाम होने में बस थोड़ी सी देरी हो |

उसमे हया का  नाज़ुक सा अंदाज़ हो ,
थोड़ा सन्नाटा हो थोड़े अल्फ़ाज़ हों ,
उसके गालों को नरमी से सहलाऊँ  मैं,
आगे और थोड़ी गुस्ताख़ी कर जाऊं  मैं |

होंठों से होंठों का स्पर्श होगा ,
अहा कितना मदमस्त वो रस होगा ,
मेरे बालों में होगी उसकी नाज़ुक कलाई ,
गगन में अब चाँदनी निकल आई |

वो बोलेगी छोडो अब रात होगी ,
आज जाने दो कल फिर मुलाक़ात होगी ,
फिर मचलकर मेरे सीने से लिपट जाएगी वो ,
बनकर गुड़िया बाँहों में सिमट जाएगी वो |

अब पगडंडियों पर वो मुझसे दूर जा रही है ,
लेकर मेरा चैनों-सुकून  जा रही है ,
ऑंखें दूर तलक देखतीं है उसकी तलाश में ,
फिर मै भी घर चल पड़ता हूँ कल मिलने की आस में |

:-मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Mohit mishra (mukt) on Tuesday

आदरणीय  Ravi Shukla जी कविता पर उपस्थिति होने एवं त्रुटिअवलोकन के लिए दिल से शुक्रिया | मेरी रचनाओं में सम्पूर्णता लाने के लिए आप जैसे मेहनीय लोगों के सुझावों का हमेशा से पालन करता रहा हूँ | अगली रचनाओं में शायद ऐसी शिकायत आपको न होगी | सादर 

Comment by Ravi Shukla on July 17, 2017 at 6:19pm
आदरणीय मोहित जी कविता का अच्छा प्रयास हुआ है उसके लिए आपको बधाई किंतु पूरी विनम्रता के साथ निवेदन करना चाहेंगे कि इसमें शिल्प का निर्वाह नहीं हो पाया है केवल तुकांत पर ध्यान दिया गया है प्रेयसी के साथ एकांत के क्षणों में अनुभव की जाने वाली कल्पना का वर्णन आपने किया है जिसमें कथ्य या भाव पक्ष की गंभीरता का अभाव हमें लगा है, हो सकता है यह हमारा व्यक्तिगत अवलोकन हो किंतु रचना पर हमने जो अनुभव किया वही पाठकीय र दृष्टिकोण प्रस्तुत है यदि भाव पक्ष पर पुनर्विचार करें तो कदाचित एक अच्छी रचना बन सकती है सादर
Comment by Mohit mishra (mukt) on July 17, 2017 at 1:34pm

आदरणीय हरी जी सदर धन्यवाद 

Comment by Mohit mishra (mukt) on July 17, 2017 at 1:33pm

श्रीमान मोहम्मद आरिफ़ जी कविता को ध्यान से पढ़ने एवं सुझाव के लिए हार्दिक धन्यवाद 

Comment by Mohit mishra (mukt) on July 17, 2017 at 1:31pm

आदरणीया कल्पना जी सादर धन्यवाद

Comment by Mohit mishra (mukt) on July 17, 2017 at 1:31pm

आदरणीय समर सर उत्साह वर्धन के लिए धन्यवाद 

Comment by Hari Prakash Dubey on July 16, 2017 at 3:55pm

आदरणीय  Mohit mishra जी ,सुन्दर प्रयास है ,इस रचना पर बधाई स्वीकार करें ! सादर 

Comment by Mohammed Arif on July 16, 2017 at 3:50pm
आदरणीय मोहित मुक्त जी आदाब ,प्रेम रस में डूबी अच्छी रचना का प्रयास किया आपने । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । आपने कई जगह वर्तनीगत अशुद्धियाँ की है जैसे-अल्हड-अल्हड़ ,नाचूं-नाचूँ,नाजुक-नाज़ुक,पिले-पीले,बसूं-बसूँ ,अंदाज-अंदाज़ ,गुस्ताखी-गुस्ताख़ी , मै-मैं,चांदनी-चाँदनी ,सूकून-सुकून, मुलाकात-मुलाक़ात आदि । देखिएगा ।
Comment by KALPANA BHATT on July 16, 2017 at 3:24pm

आदरणीय मोहित जी अच्छी कविता हुई है | हार्दिक बधाई |

Comment by Samar kabeer on July 16, 2017 at 3:17pm
जनाब मोहित मुक्त साहिब आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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