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खूंटी पर टंगी कमीज़ को ....

खूंटी पर टंगी कमीज़ को ....

जब जब
मैं छूती हूँ
खूंटी पर
टंगी कमीज़ को
मेरा समूचा अस्तित्व
रेंगने लगता है
उस स्पर्शबंध के आवरण में
जहां मेरा शैशव
निश्चिंत सोया करता था
अब
जब आप नहीं रहे
मैं इस कमीज़ में
आपको महसूस करती हूँ
सामना करती हूँ
हर उस दूषित दृष्टि का
जो मेरे शरीर पर
अपनी कुत्सित भावनाओं की
खरोंचें डालती है
मेरी दृष्टिहीनता को
मेरी कमजोरी मानती है

न, न
आप क्यूँ डरते हैं
आप ने ही तो मुझे
मन की आँखों से देखना
सिखाया है
आप नहीं हैं
पर है
इस खूंटी पर
टंगी कमीज में
आपके होने का विश्वास
पापा

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 670

Comment

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Comment by Sushil Sarna on July 17, 2017 at 4:43pm

आदरणीया कल्पना भट्ट जी सृजन के भावों को सहमति देती आपकी मधुर प्रशंसा का दिल से आभार । 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 16, 2017 at 6:38pm

अत्यंत मार्मिक रचना हुई है आदरणीय सुशिल सरना जी | हार्दिक बधाई |

Comment by Sushil Sarna on June 7, 2017 at 10:38am

आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी  भावों को आत्मीय मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on June 7, 2017 at 10:37am

आदरणीय Mahendra Kumar जी  सृजन के आत्मीय भावों से अलंकृत करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on June 7, 2017 at 10:36am

आदरणीय मो.आरिफ साहिब सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार। 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 6, 2017 at 5:14pm

अत्यंत  मार्मिक, वाह  

Comment by Mahendra Kumar on June 6, 2017 at 9:12am

पिता-पुत्री के रिश्ते को "खूंटी पर टंगी कमीज़" के माध्यम से बहुत ख़ूबसूरती से उकेरा है आपने आ. सुशील सरना जी. मेरी तरफ से हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Mohammed Arif on June 6, 2017 at 8:02am
आदरणीय सुशील सरना जी आदाब,बहुत ही सुंदर भावपूर्ण अभिव्यक्ति । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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