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तरही गजल : दिन सुहाने हो गये राते सुहीनी हा गईं

2122   2122   2122   212

दिन सुहाने हो गए राते सुहानी हो गईं,
उनके आते ही बहारें जाफ़रानी हो गईं।

रंग और खुशबू की बातें अब कहानी हो गईं,
मुश्किलें लगता है जैसे जाविदानी हो गईं।

आसमाँ ने जब उफ़क पर चूम धरती को लिया,
कमसिनी को छोड़कर ऋतुएं सुहानी हो गईं।

बेकरारी आज जितनी है कभी पहले न थी,
आदतें भी सब्र की जैसे कहानी हो गईं।

मिहनतों को जब मिला तेरा सहारा ए ख़ुदा,
मुश्किलें भी मेरी घट कर दरमियानी हो गईं।

रेत का इक सैल आया सब उड़ाकर ले गया,
क़ैस की तन्हाइयाँ फिर से ख़ज़ानी हो गईं।

जल गया था तूर तेरे नूर की पाकर झलक,
ख़्वाहिशें मेरी जो थीं वो लनतरानी हो गईं'।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by आशीष यादव on April 1, 2017 at 2:28pm
बहुत खूब। बधाई कुबूल करें।
Comment by Mohammed Arif on April 1, 2017 at 2:23pm
आदरणीय रवि शुक्ला जी आदाब, बहुत बेहतरीन तरही ग़ज़ल । शेर दर शेर दाद के साथ मुबारकबाद कुबूल कीजिए ।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 31, 2017 at 9:44pm

.मुहतरम जनाब . रवि साहिब , बहुत ही बेहतर ग़ज़ल हुई है,शेर दर शेर दाद और
मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ---- शेर 6 के उला में शब्द ''सैल '' का इस्तेमाल सही नहीं लगता
क्यूँ कि इसका मतलब , बहाओ , लहर , पानी की रौ , है , '' झोका '' या इस से मिलता,जुलता
शब्द होना चाहिए , आखरी शेर के दोनो मिसरों में निसबत की कमी है , देख लीजिएगा --सादर

Comment by Samar kabeer on March 31, 2017 at 9:30pm
जनाब रवि शुक्ल जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on March 31, 2017 at 6:44pm

आदरणीय रवि साहेब.......बहुत खूब .......हार्दिक बधाई 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 31, 2017 at 4:49pm

वाह वा वाह ..आ. रवि जी.... आयोजन की कमी को आपने यहाँ पूरा कर दिया ..
बधाई 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 31, 2017 at 4:49pm

वाह वा वाह ..आ. रवि जी.... आयोजन की कमी को आपने यहाँ पूरा कर दिया ..
बधाई 

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