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यह सियासत आप पर हम पर कहर होने को है

2122 2122 2122 212

पग सियासी आँच पर मधु भी जहर होने को है।
बच गया ईमान जो कुछ दर-ब-दर होने को है।।

मुफलिसों को छोड़कर गायों गधों पर आ गई।
यह सियासत आप पर हम पर कहर होने को है।।

उड़ रहा है जो हकीकत की धरा को छोड़ कर।
बेखबर वो जल्द ही अब बाखबर होने को है।।

वो जो बल खा के चलें इतरा के घूमें कू-ब-कू।
खत्म उनके हुस्न की भी दोपहर होने को है।।

जुल्म से घबरा के थक के हार के बैठो न तुम।

"हो भयावह रात कितनी भी सहर होने को है॥"


आशीष यादव
मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by आशीष यादव on September 12, 2020 at 5:12am

आदरणीय श्री गिरिराज भंडारी जी गजल पर आपकी आमद एवं हौसला अफजाई के लिए शुक्रिया।

Comment by आशीष यादव on September 12, 2020 at 5:11am

आदरणीय श्री महेंद्र कुमार सर गजल पर आपकी आमद एवं हौसला अफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 7, 2017 at 1:15pm

आदरणीय आशीष भाई , बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है , हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार कीजिये ।

Comment by Mahendra Kumar on March 6, 2017 at 7:09pm
आदरणीय आशीष जी, बढ़िया ग़ज़ल लिखी गई आपने। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। "हो भयावह रात कितनी भी सहर होने को है", मेरी समझ से यह मिसरा ठीक है। सादर
Comment by आशीष यादव on March 4, 2017 at 8:36pm

आदरणीय विद्वजन अंतिम बेबहर मिसरे ( इस भयावह रात की भी सहर होने को है।। ) के स्थान पर क्या यह मिसरा उचित रहेगा?

"हो भयावह रात कितनी भी सहर होने को है॥"

कृपया उचित सुझाव दीजिये।

Comment by आशीष यादव on March 4, 2017 at 8:23pm

आदरणीय Mohammed Arif जी बहुत बहुत आभार।  आप ने मुझे इतना मान दिया।

Comment by आशीष यादव on March 4, 2017 at 8:23pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी बहुत बहुत आभार।  आप ने मुझे इतना मान दिया।

Comment by आशीष यादव on March 4, 2017 at 8:21pm

आदरणीय JAWAHAR LAL SINGH जी बहुत बहुत आभार।

Comment by आशीष यादव on March 4, 2017 at 8:20pm

आदरणीय Dr Ashutosh Mishra  जी बहुत बहुत आभार। गलती से अवगत कराने का शुक्रिया।


इस भयावह रात की भी सहर होने को है।।

यह मिसरा बहर से बाहर है।

Comment by आशीष यादव on March 4, 2017 at 8:16pm

आदरणीय Gurpreet Singh जी बहुत बहुत आभार। गलती से अवगत कराने का शुक्रिया।

कृपया ध्यान दे...

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