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ग़ज़ल -है बोलने का मुझे इख़्तियार, कह दूँ क्या - ( गिरिराज )

1212   1122   1212    22 /122

सुनें वो गर नहीं,तो बार बार कह दूँ क्या

है बोलने का मुझे इख़्तियार, कह दूँ क्या

 

शज़र उदास है , पत्ते हैं ज़र्द रू , सूखे

निजाम ए बाग़ है पूछे , बहार कह दूँ क्या

 

कहाँ तलाश करूँ रूह के मरासिम मैं

लिपट रहे हैं महज़ जिस्म, प्यार कह दूँ क्या

 

यूँ तो मैं जीत गया मामला अदालत में

शिकश्ता घर मुझे पूछे है, हार कह दूँ क्या

 

यूँ मुश्तहर तो हुआ पैरहन ज़माने में

हुआ है ज़िस्म का भी इश्तिहार, कह दूँ क्या

 

हाँ, लहज़ा तल्ख़ था लेकिन कही हक़ीकत थी

ज़रा सा पूछ तो लेते, कि ख़ार कह दूँ क्या

 

वो, एक लम्हा भी जिसने मुझे हँसाया है

ये दिल कहे, उसे परवर दिगार कह दूँ क्या

 

*****************************************

 मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 1, 2017 at 6:58pm

बहुत सुंदर ग़ज़ल आद० गिरिराज जी हर शेर पर दाद कुबूलें .

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 1, 2017 at 3:33pm

आ. गिरिराज जी,
ग़ज़ल के लिये बधाई ..
लिपट रहे हैं सिर्फ़ जिस्म, प्यार कह दूँ क्या.... ये मिसरा बेबहर है... सिर्फ को फ़क़त कर लें ..
सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 1, 2017 at 11:03am

बेहतरीन आ. गिरिराज जी बहुत बहुत बधाई आपको, जहाँ तक सुधार की बात है यदि बेहतर मिल जाए सुधार देना अच्छा है।

Comment by Ravi Shukla on February 28, 2017 at 5:07pm

आदरणीय गिरिराज भाई जी हमारे कहे को मान देने के लिये हार्दिक आभार

Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 28, 2017 at 1:18pm
आदरणीय गिरिराज भाईसाब आपकी हर रचना मुझे बेहद वसंद आती है लकिन यह रचना मुझे इतनी भाई मैं बयान नहीं कर सकता हूँ ढेर सारे बधाई के साथ सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 28, 2017 at 11:13am

आदरनीय रवि भाई , ग़ज़ल पर उपस्थिति और सराहना के लिये आपका हृदय से आभार ।आपका कहना सही है , ऐब ए तनाफुर है मिसरे में -- कहाँ तलाश करूँ रूह के मरासिम मैं --  इस मिसरे को   ऐसा  कर रहा हूँ ...

कहाँ तलाश करूँ रूह के मरासिम अब ...

Comment by Ravi Shukla on February 28, 2017 at 10:07am

बढि़या ग़ज़ल हुई है आदरणीय गिरिराज भाई जी बहुत बहुत बधाई तीसरे शेर के आखिरी रुक्‍न में ( मरासिम मैं ) में उच्‍चारण में शब्‍द कुछ विकृत होता लग रहा है ( तनाफुर ) मात्रा तो अलग है पर उच्‍चारण को देखते हुए क्‍या इसे सुधारा जाना चाहिये । मार्ग दर्शन दीजियेगा । सादर ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 28, 2017 at 9:05am

आदरनीय बृजेश भाई , आभार आपका ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 28, 2017 at 9:05am

आदरनीय के पी अनमोल भाई , हौसला अफज़ाई का शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 28, 2017 at 9:04am

आदरनीया छाया जी ,उत्साह वर्धन के लिये आभार आपका ।

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