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 2112   2112   2112   2112

रात ढली मुझे पिला और जहर और जहर

इश्क ही ढाता है सदा और कहर और कहर

                      

गाँव से भी दूर हुयी सुरमई माटी की गमक

दीखता हर ओर जिला और शहर और शहर

 

मौसम अब यार मुझे खुशनुमा लगते है सभी

दिल में उठती है लहर और लहर और लहर

 

रात ये बचपन की बड़ी सादगी में बीत गयी

अब है जवानी की सहर और सहर और सहर 

 

जोश में सागर तू मचल आज है पूनम की कला  

बीच लहर चाँद खिला और छहर और छहर

 

मन नहीं भरता है कभी साथ जो होता है तेरा

जाने की तू बात न कर और ठहर और ठहर 

 

आज तेरी ओढ़नी से खेल रही सर्द हवा 

बोल इसे दूर कही और फहर और फहर

 

 (मौलिक /अप्रकाशित)

 

 

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 19, 2017 at 9:18pm

आदरनीय बड़े भाई ,  गज़ल अच्छी कही है आपने हार्दिक बधाइयाँ । मतले पर आपको  सलाह आ. सुरेन्दर भाई दे ही चुके है , मै भी उनसे सहमत हूँ । सुधार लीजियेगा ।

Comment by indravidyavachaspatitiwari on February 19, 2017 at 5:24pm

हम आपकी रचना के कायल हो रहे हैं आपकी रचना में जो वास्तविकता है वह काबिले तारीफ है आपकी कल्पना की उड़ान सराहना चाहती है। बधाई हो

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 18, 2017 at 8:11am

आ० कुशक्षत्रप जी,  आपका कथन सही है मेरी लापरवाही से ' मुझे पिला'में बह्र गड़बड़ हुयी है , मैं इसे अवश्य सही कर लूंगा . शहर , जहर , बहर  हिन्दी के स्वीकृत शब्द हैं . दीखता शब्द भी हिन्दी में बहु-प्रयुक्त है .आपकी सम्मति से  बहर का फिर से परीक्षण कर लूंगा . आपने गजल में इतनी रूचि ली इसके लिए आभारी हूँ , सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 18, 2017 at 7:58am

आ० ब्रजेश जी ,  बहुत शुक्रिया

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 18, 2017 at 7:57am

आ० तेजवीर जी बहुत आभार

Comment by नाथ सोनांचली on February 18, 2017 at 4:43am
आद0 गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी सादर अभिवादन। गजल पर आपके प्रयास की भूरी भूरी प्रशंशा करता हूँ। कुछ बिंदुओं पर मैं ध्यान दिलाना चाहूँगा।
जह्र, कह्र, शह्र का वज्न 21 है उस लिहाज से देखा जाये तो कुछ त्रुटियां मिलेगी पर अगर वज्न 12 ले भी लिया जाये तो मतला देखें
रात ढली मुझे पिला और जहर और जहर
रत 21 ढली 12 मुझे 12 पिला 12 और 21
यहाँ मुझे पिला आपके बह्र के हिसाब से 2112 होना चाहिए जबकि 1212 है, यह बह्र में कैसे सादर।
दिखता शुद्ध वर्तनी है, यह भी बेबहर हो जायेगा।
ऐसे ही देख लीजिए, यह सब मैंने अपनी जानकारी के लिए पूछा है क्योंकि मुझे खुद अभी सीखना है।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 17, 2017 at 5:12pm
वाह वाह आदरणीय बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल..सादर
Comment by TEJ VEER SINGH on February 17, 2017 at 1:01pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन जी। हार्दिक बधाई।बेहतरीन गज़ल।

मन नहीं भरता है कभी साथ जो होता है तेरा

जाने की तू बात न कर और ठहर और ठहर 

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