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देर तक .....

देर तक
मैं मयंक को
देखती रही
वो वैसा ही था
जैसा तुम्हारे जाने से
पहले था
बस
झील की लहरों पे
वो उदास अकेला
तैर रहा था

देर तक
मैं उस शिला पर
बैठी रही
जहां हम दोनों के
स्पर्शों ने सांसें ली थीं
शिला अब भी वैसी ही थी
जैसी
तुम्हारे जाने से पहले थी
बस
मैं
और थे मेरी देह में
समाहित
तुम्हारे अबोले स्पर्श

देर तक
मैं अपने अधरों पे
तुम्हारे अधरों की
कंपन जीती रही
अपनी पलकों पे
तुम्हारी साँसों की गर्माहट
महसूस करती रही
सांझ की बेला में
तुम्हारी आहटों को जोहते
मैं
वेणी में गज़रा भी
वैसे ही लगाती रही
जैसा तुम्हारे जाने से पहले
लगाती थी
बस अब
किसी की मुहब्बत
वेणी के गज़रे से खेलकर
उसे बिखेरती नहीं
उसकी सुगंध भी
शायद
किसी की कमी से
महकना भूल गयी

देखो !
देर तक
इस देर को
अब
देर न रहने देना
तुम्हारी कसम
जी न पाऊंगी
मैं
अब
तुम बिन
देर तक

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on January 25, 2017 at 3:15pm

आदरणीय मिथिलेश जी प्रस्तुति को अपना आत्मीय स्नेह देने का हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on January 25, 2017 at 3:15pm

आदरणीय गिरिराज जी भाई साहिब प्रस्तुति के भावों को आत्मीय मान देने का हार्दिक आभार।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 25, 2017 at 12:22am

आदरणीय सुशील सरना सर, बढ़िया भावाभिव्यक्ति हुई है. हार्दिक बधाई. सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 24, 2017 at 9:22pm

आदरणीय सुशील भाई , विरह का दर्द  और मिलन की खातिर चाटपटाहट दोंनो खूब शब्द पाये हैं । आपको इस कविता के लिये हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by Sushil Sarna on January 23, 2017 at 1:13pm

आदरणीय समर कबीर साहिब प्रस्तुति को अपनी स्नेह बरखा से पल्लवित करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Samar kabeer on January 22, 2017 at 2:04pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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