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गजल(आँधियों से बेखबर पत्ते बहुत..)

2122 2122 212
आँधियों से बेखबर पत्ते बहुत
रह गये जो झेलते सहमे बहुत।1

मौन हो बहती हवा,पुचकारती,
अनकहे सब राज हैं गहरे बहुत।2

बेसबर खुद में समंदर डूबता
तैरते हैं बेधड़क तिनके बहुत।3

बह रहा पानी बना सब देखिये,
जो सँजोये लुट गये सपने बहुत।4

डर गये अपना जताने से यहाँ,
वाकये ऐसे हुए अब के बहुत।5

भागते फिरते अँधेरे रात के
रोशनी के जा रहे सदके बहुत।6

सींचने का अब समय तो आ गया
जड़ कटी है पेड़ की पहले बहुत।7
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment by Manan Kumar singh on January 20, 2017 at 10:58pm
आपका आभार आ.महेंद्र जी
Comment by Mahendra Kumar on December 18, 2016 at 10:06am
बढ़िया ग़ज़ल है आदरणीय मनन जी। हार्दिक बधाई। सादर।
Comment by Manan Kumar singh on December 17, 2016 at 7:14pm
आभार आपका आदरणीय आशुतोष मिश्र जी,सादर।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 16, 2016 at 11:35pm
आदरणीय मनन जी इस रचना को गुनगुनाने में बड़ा मजा आया हर रैना पर आदरणीय समर सर की उपस्थिति से प्रतिक्रियाओं से बहुत कुछ सीखने को मिलता है सादर
Comment by Manan Kumar singh on December 15, 2016 at 8:15am
मोहतरम समर साहिब आदाब व आभार
Comment by Samar kabeer on December 14, 2016 at 5:00pm
जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल है, दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
तीसरे शैर के ऊला मिसरे में'बेसबर'की जगह "बेसबब'शब्द ज़ियादा मुनासिब होगा,वैशे भी सही शब्द है। "बे सब्र"देखियेगा ।

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