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रेत को आब-ए-रवाँ और धूप को झरना लिखा - ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

रेत को आब-ए-रवाँ और धूप को झरना लिखा

बेखुदी में तूने मेरे दोस्त ये क्या-क्या लिखा

 

वो तो सीधे रास्ते पर था मगर यह देखिये

नासमझ लोगो ने उसका हर क़दम उल्टा लिखा

 

एक मुद्दत से अदब में है सियासत का चलन

मैं अलग था नाम के आगे मेरे झूठा लिखा

 

जब तेरे दिल में कभी उभरा जो मंज़र शाम का

तूने काग़ज़ पर महज मय सागर-ओ-मीना लिखा

 

अब मुहब्बत पर अक़ीदत ही नहीं है लोगों को

इसलिए पाक़ीज़गी को ही तेरी धोखा लिखा

 

मेरे चेहरे पर न जाने क्या दिखा था उसको जो

उसने दिल को मेरे इक टूटा हुआ शीशा लिखा

 

बेख़बर हूँ रोज़-ओ-शब की ग़र्दिशों से क्या कहूँ

कब तलक मेरे मुकद्दर में है अँधियारा लिखा

-मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by rajesh kumari on December 15, 2016 at 6:11pm

वाह्ह्ह वाह बहुत उम्दा ग़ज़ल कही है शिज्जू जी ,अनेकानेक बधाईयाँ 

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on December 5, 2016 at 10:30pm
शिज्जु साहिब आदाब,बेहद खूबसूरत ख़यालपोशी हुई है दिली दाद कुबूल फरमाएं।
Comment by नाथ सोनांचली on December 4, 2016 at 1:05am
आदरणीय शिज्जू शकूर साहब सादर अभिवादन, बहुत ही उम्दा गजल लिखी है आपने, हर शेर दमदार। शेर दर शेर दाद क़ुबूल फरमाएं। सादर
Comment by Mahendra Kumar on December 3, 2016 at 6:53pm
बहुत ही शानदार ग़ज़ल है आदरणीय शिज्जु सर। शेर दर शेर दाद क़ुबूल कीजिए। सादर।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 3, 2016 at 11:58am

रेत को आब-ए-रवाँ और धूप को झरना लिखा

बेखुदी में तूने मेरे दोस्त ये क्या-क्या लिखा--------------बेहतरीन आ० शिज्जू  भाई


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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 3, 2016 at 11:01am

आ. विजय निकोर सर आपका बहुत बहुत शुक्रिया


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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 3, 2016 at 11:01am

आ. लक्ष्मण धामी जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 3, 2016 at 11:00am

आ. गिरिराज भंडारी जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 3, 2016 at 11:00am

आ. Nidhi Agrawal जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 3, 2016 at 11:00am

बहुत बहुत शुक्रिया आ. वासुदेव अग्रवाल जी

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