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गुरु महिमा (दोहा छन्द)/सुरेश कुमार ' कल्याण '

धन दौलत के फेर में, फैल रहा अन्धेर।
गुरु मारग पै चालिये, ना भटकेगा फेर।1।

दया धर्म अरु ज्ञान बिन, मिथ्या है अभिमान।
गुरु बिन तीनों ना मिलैं,सम हैं गुरु भगवान ।2।

दया धर्म सब व्यर्थ हैं, व्यर्थ पड़ा सब ज्ञान।
शीश झुके गुरु चरण में, मिले सन्त सुजान।3।

गुरु की राह न त्यागिये, यही गुणों की खान।
गुरु को छाड़ैं ना मिलै, कहीं प्रेम आराम।4।

गुरु बिन गति हो ज्ञान की, जैसे धनु बिन बाण।
सच्चे गुरु की ओट में, पूरे हों अरमान।5।

गुरु की महिमा मानिये,गुरु हरता अभिमान।
सतगुरु मन से पूजिये, मिल जाएं भगवान।6।

गुरु का घटता देखकर, जनमानस में मान।
भगवन चिंता हो रही, कैसे हो ' कल्याण '।7।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 10, 2016 at 9:40pm
आदरणीया अर्पणा शर्मा जी सादर आभार ।
आपको दोहा रचना पसंद आई अहोभाग्य ।
Comment by Arpana Sharma on October 10, 2016 at 4:21pm
गुरू महिमा के प्रेरक दोहे। बहुत अच्छी रचना आ.सुरेश"कल्याण" जी
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 10, 2016 at 9:39am
आदरणीय श्री रामबली गुप्ता जी उचित मार्गदर्शन हेतु हृदयतल से आभार । आपके द्वारा दिए गए सुझावों पर अमल करने की कोशिश करता हूं । सादर ।
Comment by रामबली गुप्ता on October 10, 2016 at 3:33am
शब्द कलों के सही प्रयोग से सही गेयता और प्रवाह मिलेगा। सार्थक प्रयास के लिए पुनः बधाई।सादर
Comment by रामबली गुप्ता on October 10, 2016 at 3:28am
दोहों पर प्रयास बहुत ही सुंदर है आद0 सुरेश भाई जी। दिल से बधाई लीजिये।
अव्वल बताना चाहूँगा की 'गुरु' के स्थान पर 'गुर' शब्द का प्रयोग करना उचित प्रतीत नही होता जबकि दोनों में 2 मात्रा ही है। सम्भवतः आपने गुरु को गुरू पढ़ते हुए तीन मात्रा गिना है इसके कारण कई जगह शिल्प भी भंग है।
इसी प्रकार एक दो स्थान पर शिल्प बुनावट में भी त्रुटि हो गयी है जैसे-
गुरु बिन ज्ञान हो ऐसा ........ यहां चरणान्त में शिल्प गलत है। विषम चरणों की बुनावट इस प्रकार रखिये की अंत में उर्दू वह्र के अनुसार 212 का मात्रा संयोजन आये। इसके लिए शब्द कलों को समझना जरूरी होता है।
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 9, 2016 at 8:00pm
आदरणीय श्री सुरेंद्र जी रचना अनुमोदन के लिए हार्दिक आभार । सादर ।
Comment by नाथ सोनांचली on October 9, 2016 at 10:50am
आदरणीय श्री सुरेश कुमार 'कल्याण' जी आपकी रचना से प्रभावित हूँ। सच्चे गुरु के बिना ज्ञान नही मिल सकता और बिन ज्ञान बेडा भी पार नहीं हो सकता। आपको बधाई खुबसूरत रचना के लिए

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