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ग़ज़ल -तब अलग थी, अब जवानी और है ( गिरिराज भंडारी )

ग़ालिब साहब की ज़मीन पर एक प्रयास

तब अलग थी, अब जवानी और है

2122   2122    212  --

शक्ल में जिनकी कहानी और है

क्या उन्होनें मन मे ठानी और है

 

लफ़्ज़ तो वो ही पुराना है मगर

आज फिर क्यों निकला मअनी और है

 

हाथ में पत्थर है, लब खंज़र हुये

तब अलग थी, अब जवानी और है

 

है समंदर की सतह पर यूँ सुकूत

पर दबी अब सरगिरानी और है

 

साजिशें सारी पस ए परदा हुईं

पर अयाँ जो है ज़बानी,.. और है  

 

बात सारी दोस्ती की कर रहे  
पर अमल की कुछ बयानी और है

 

अब हक़ीकत है यहाँ बदली हुई

अब उधर की भी कहानी और है
******************************
मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 3, 2016 at 5:38pm

इस ग़ज़ल पर काफी चर्चाएँ हो गई हैं, आ. गिरिराज भंडारी जी अब मेरी तरफ से बधाई आपको :-)


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 3, 2016 at 5:34pm

आदरणीय राम बली भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका हृदय से आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 3, 2016 at 5:33pm

आदरनीय रवि भाई , आप ये बात दिल से निकाल दीजिये कि यहाँ कोई किसी को सिखा सकता है , ओबी ओ मे सभी एक दूसरे से सीखते हैं और अगर कहीं किसी ने गलती की है तो उसे गलत कहने का अधिकार सभी को है । बड़े भाई की हैसियत अलग बात है और सीखने के क्रम मे हुई गलती अलग बात है , मेरी उम्र  मुझे गलतियाँ करने का अधिकार नही दे तीं ।
आप साधिकार गलती बता सकते हैं , और मुझे भी उसे नम्रता से स्वीकार करना चाहिये , और सुधारने की कोशिश भी  करनी चाहिये ।

मेरे कहने का केवल ये अर्थ था कि , आप साफ नही बतायेंगे तो मै सुधारूँगा क्या ?

खैर .. आ. समर भाई जी की बात से  कुछ समजह मे आ गया कि कहाँ कमज़ोरी है ,  तदानुसार मै सुधार कर लूँगा । आभार आपका ।

Comment by रामबली गुप्ता on October 3, 2016 at 4:04pm
वाह वाह आद0 गिरिराज भाई जी इस बेहतरीन गजल के लिए शैर दर शैर बधाई लीजिये।
Comment by Ravi Shukla on October 3, 2016 at 2:47pm

आदरणीय समर साहब हक बयानी को कर्तव्‍य की वास्‍तविकता के अर्थ मे लिया जा सकता है तो इस शब्‍द से इत्‍तफाक हम भी रखते है 

Comment by Ravi Shukla on October 3, 2016 at 2:47pm

आदरणीय गिरिराज भाई जी आपसे सीख कर आपके शेर को गलत कहने की हिमाकत हम नहीं कर सकते हमारा मंतव्‍य केवल यह है कि कुछ बयानी के बाद रदीफ का 'और है' में कुछ शब्‍द सही प्रतीत नहीं हो रहा 

अब हक़ीकत है यहाँ बदली हुई

अब उधर की भी कहानी और है आपके इस शेर में काफिया जिस तहर खुद ब खुद अपने अर्थ के साथ्‍ा आ रहा है उस तरह कुछ बयानी में हमें महसूस नहीं हुआ इस लिये निवेदन किया था । आप से निरन्‍तर मिल रहे अग्रजवत स्‍नेह के कारण ही इतना कहने का साहस हुआ है । 

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 2, 2016 at 7:11pm
आ गिरिराज जी सुंदर गजल के लिए आपको नमन है।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 2, 2016 at 5:09pm

आदरणीय कालीपद भाई , हसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया आपका ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 2, 2016 at 5:08pm

आदरणीय समर भाई , आपा शुक्रिया , मै पहले मानी ही लिखने वाला था --- '' वक़्त कहता है कि मानी और है ''  सही शब्द लिखने के चक्क्रर मे  ऐसा किया था ।
आज ये लगता है मानी और है
वक़्त कहता है कि मानी और है       ---  दोनो मे से कोई एक रख लूँगा ,  मानी शब्द  आज चलन मे है , और इसक उपयोग इस मंच म्मे पहले भी हो चुका है , इसलिये मै कोई कमी महसूस नही करता ।

Comment by Kalipad Prasad Mandal on October 2, 2016 at 4:43pm

आ गिरीराज जी, बहुत खुबसूरत ग़ज़ल के लिए  हार्दिक बधाई |

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