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क्यों खामोश हो
कुछ बोलते भी नहीं
कुछ कहते भी नहीं
कुछ सुनते भी नहीं

वो देखो वहाँ
क्षितिज के किनारे
आकार ले रहा है
प्यार बादलों में

वो देखो  वहाँ
उन लहरों को
जो कर रही है बयां
प्यार चट्टानों से

वो देखो वहाँ
उन परिंदो को
जो उड़ते हुए भी
कर रहे बातें बादलों से

वो देखो वहाँ
रंग बदलते आस्मां को
किस तरह रंग बदलता है
बिलकुल तुम्हारी ही तरह

गुलाबी फ़ज़ाओं में
नारंगी का रस घोले
हरी सुकुमारी पर
बिछायी यह काली बदरी

कितने बदल गए हो तुम
पल में ही बरस पड़े हो |
देख रहे हो
कितने खामोश हैं सब यहाँ !

 

सब कुछ है यहाँ

फिर भी यह कैसी ख़ामोशी !

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 24, 2016 at 6:29pm

धन्यवाद आदरणीय सतविन्द्र भैया |

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on September 23, 2016 at 6:16pm
प्रकृति का मानवीयकरण करने की यह उम्दा कोशिश हुई है।बेहतरीन भावोद्गार हुआ है।बहुत् बहुत बधाई आदरणीया कल्पना दीदी।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 23, 2016 at 5:47pm

धन्यवाद आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी |

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 23, 2016 at 5:46pm

सादर धन्यवाद् आदरणीय सुरेश कुमार 'कल्याण ' जी |

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 23, 2016 at 5:45pm

आदरणीय सुशिल सरना जी , मुझे बिलकुल बुरा नहीं लगा न ही लगेगा | जी आपने सही कहा था शाब्दिक दोष थे जिसको सही कर दिया है | आपका बहुत बहुत धन्यवाद् | सादर |

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 23, 2016 at 5:42pm

आदाब जनाब समर साहब |  आपको कविता पसंद आई सार्थक हुआ मेरा यह प्रयास | सादर धन्यवाद | 

Comment by Shyam Narain Verma on September 23, 2016 at 2:48pm

बहुत सुन्दर ... सादर बधाई स्वीकारें

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 23, 2016 at 1:16pm
आदरणीया कल्पना भट्ट जी बहुत ही सुन्दर प्रकृति चित्रण एवं बिंब विधान।सुन्दर रचना पर हार्दिक बधाई । सादर ।
Comment by Sushil Sarna on September 22, 2016 at 9:09pm

आदरणीय कल्पना भट्ट जी भावों का सुंदर सम्प्रेषण हुआ।  हार्दिक बधाई।  हाँ कहीं कहीं शाब्दिक दोष अखरता है जैसे -खोमोश=ख़ामोश ,रहीं है =रही हैं ,रास =रस।  कृपया देख लें।  कृपया अन्यथा भी न लेवें। सदर। .. 

Comment by Samar kabeer on September 22, 2016 at 7:01pm
मोहतरमा कल्पना भट्ट साहिबा आदाब,बहुत उम्दा कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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