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नशीली आग़ोश ....

अरसा हुआ तुमसे बिछुड़े हुए 

ख़बर ही नहीं
हम किस अंधी डगर पर
चल पड़े
हमारी गुमराही पर तो
कायनात भी खफ़ा लगती है

बाद बिछुड़ने के
मुददतों हम
आईने से नहीं मिले
ख़ुद अपनी शक्ल से भी हम
नाराज़ लगते हैं


तुम्हें क्या खोया
कि अँधेरे हम पर
महरबान हो गए
यादों के अब्र
चश्मे-साहिल के
कद्रदान गए
दरमानदा रहरो की मानिंद
हमारी हस्ती हो गयी

इश्क-ए-जस्त की फ़रियाद
करें भी तो किससे


दिल बेदर की दीवारों में
कैद हो गया

अब शब की ख़बर नहीं
सहर भी जाने कब गुजर जाती है
तुमसे मिलने में
तारीकियों की साज़िश है
जाने किन सुलगते ख़्वाबों की
चंद साँसों में आतिश है


जाने कब वो आहट होगी
जो मुझे मेरेअफ्सुर्दा
लम्हों की क़बा से
रिहा कराएगी
वो नशीली आग़ोश
इस मर्गे-बदन को
ज़िंदगी दे जाएगी

दरमानदा=भटका हुआ , रहरो=मुसाफ़िर,
जस्त =चोट ,मर्गे-बदन=बदन की मौत

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on July 22, 2016 at 7:50pm

आदरणीया KALPANA BHATTजी  प्रस्तुति को अपने मधुर शब्दों से अलंकृत करने का तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 22, 2016 at 6:11pm

वाह वाह सुंदर भावपूर्ण रचना के लिए बधाई स्वीकारें आदरणीय सुशिल सर | 

Comment by Sushil Sarna on July 22, 2016 at 3:17pm

आदरणीया राहिला जी  प्रस्तुति को अपने मधुर शब्दों से अलंकृत करने का तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by Sushil Sarna on July 22, 2016 at 3:15pm

आदरणीय समर कबीर साहिब प्रस्तुति के भावों को अनुमोदित करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on July 22, 2016 at 3:14pm

आदरणीय गिरिराज जी भाई साहिब प्रस्तुति पर आपकी नज़रे इनायत का तहे दिल से शुक्रिया। आपकी शंका का शायद आदरणीय समर कबीर साहिब की टिप्पणी से सन्तुष्ट हो गयी होगी। सदर ...

Comment by Sushil Sarna on July 22, 2016 at 3:12pm

आदरणीय रामबली गुप्ता जी प्रस्तुति को अपने स्नेहिल शब्दों से अलंकृत करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Rahila on July 21, 2016 at 6:00pm
वाह...वाह..वाह..कितनी सुंदर भावपूर्ण रचना बन पड़ी ।बहुत बधाई आदरणीय सर जी!सादर
Comment by Samar kabeer on July 21, 2016 at 2:51pm
मुहतरम आपने जो भाव बताये हैं वो मेरी नज़र में पूरी तरह स्पष्ट हो गये, पुनः बधाई स्वीकार करें ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 21, 2016 at 10:27am

आदरणीय सुशील भाई , बहुत सुन्दर भाव पूर्ण रचना हुई है , दिल से बधाइयाँ आपको ।

जैसा कि आ. समर भाई जी ने कहा है  -- चश्मे साहिल  का अर्थ   साहिल की आँख से लिया जायेगा  , आँखों  के साहिल से नहीं ।  उसके लिये  साहिले चश्म  कहना पड़ेगा , लेकिन ये कितना सही है , आ. समर भाई  ही बता पायेंगे । मै उर्दू का बहुत अधिक जानकार नहीं हूँ । अत: आ. समर भाई की प्रतिक्रिया का इंतिज़ार कीजियेगा , परिवर्तन से पहले ।

Comment by रामबली गुप्ता on July 20, 2016 at 11:00pm
आद0 सुशील सरना जी आपके अतुकांत का बिम्ब-विधान सदैव मन मोह लेता है। शब्दशः जो भाव-बिम्ब मुखरित है काबिले तारीफ़ है। दिल से मुबारकबाद कुबूल फरमाएं।

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