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शाम का धुंधलका फ़ैल रहा था, वह गाड़ी में पीछे बैठी थी, रोज़ की तरह रास्ते में वही मकान आने वाला था,  उसका दिल घबराना शुरू हो गया,  उसने अपना एक हाथ दूसरे हाथ से थाम लिया और मन ही मन बुदबुदाने लगी, "ये भेड़िये क्यों अँधेरी रातें खत्म नहीं होने देते?"

 

उसने आँखें बंद करने को सोचा ही था कि वो मकान आ ही गया और गाड़ी उस मकान को पार करने लगी, आज उसकी आँखों ने बंद होने से इनकार कर दिया|

 

उसने देखा मकान के मुख्य द्वार पर उसके शिक्षक के नाम की तख्ती थी, जिससे वो पढने जाती थी, अंदर वही पुराना बगीचा था| उसकी नज़र कांच की बंद खिड़की पर पड़ी जिसमें से रौशनी आ रही थी| खिड़की की तरफ देखते ही वह चौंकी, अंदर एक साया भाग रहा था| उसने लगभग चिल्लाते हुए ड्राईवर से कहा, "गाड़ी रोको..."

 

गाड़ी एक झटके से रुकी, दूसरे ही क्षण वह उतरी और उस मकान के अंदर दौड़ कर चली गयी, बाग़ में उसे एक दरांती दिखाई दी, उसने उसे लपक कर उठाया और अंदर भागी, किस्मत से दरवाज़ा खुला हुआ था वह अंदर घुस गयी| दरवाज़ा यूं ही खामोश खड़ा रहा|

 

कुछ मिनटों में वह बाहर आई, साथ में उसके पूर्व-महाविद्यालय की पोशाक पहने एक और लड़की थी, जिसके बाल और कपड़े अस्त-व्यस्त थे| उसने उस लड़की के कंधे पर हाथ रखा, और दूसरे हाथ में पकड़ी दरांती को उठा कर देखा, दरांती खून से सनी थी, उसके चेहरे पर घृणा के भाव आये, लेकिन अगले ही क्षण संतोष के भाव आ गए, उसने दरांती को दूर फैंक दिया और कहा,

“अब जाकर हुआ उजाला..” 

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 24, 2016 at 10:56pm

अच्छी कथा हुई है आदरणीय बधाई स्वीकारें |

Comment by Shubhranshu Pandey on March 22, 2016 at 10:55am

आदरणीय चन्द्रेश जी, 

शिक्षा और गुरू के बदलते स्वरूप बतलाते हुये एक सुन्दर कथा. 

बाग में दूर से ही सबसे पहले दराती का दिखना. महा विद्यालय में अमुमन पोशाक नहीं चला करता है. कुछ बातों को सम्भाला जा सकता है.

सादर.

 

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on March 19, 2016 at 10:50pm

रचना को पसंद करने के लिए और अपनी टिप्पणी द्वारा मेरी हौसला अफज़ाई के लिए सादर आभार आदरणीय रामबली गुप्ता जी, आदरणीय तेजवीर सिंह जी सर, आदरणीया राहिला जी 

Comment by Rahila on March 19, 2016 at 2:31pm
बेहतरीन प्रस्तुति,आदरणीय सर जी! प्रतिशोध से ज्यादा तो लड़की ने अन्याय का खातमा किया । बहुत उम्दा, हार्दिक बधाई । सादर
Comment by TEJ VEER SINGH on March 18, 2016 at 8:15pm

हार्दिक बधाई चंद्रेश जी!बेहतरीन और मार्मिक प्रस्तुति!

Comment by रामबली गुप्ता on March 18, 2016 at 7:24pm
सुंदर कहानी

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