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"ये लो इस गद्दार की लाश" एक सैनिक उस घर के बाहर खड़ा होकर चिल्लाया| आवाज़ सुनकर मोहल्ले के लोगों की भीड़ जमा हो गयी|

"इनका परिवार पुश्तों से सेना में है और आखिरी वंशज गद्दार निकला" मोहल्ले के लोगों में फुसफुसाहट होने लगी|

उसका पिता सिर झुकाये चुपचाप घर से बाहर निकला| उसकी लाल आँखें और उतरा हुआ चेहरा बता रहा था कि कुछ रातों से वह सोया नहीं है|

"देश के लोगों के खून के साथ होली खेलनी थी ना, तो आज होली के दिन ही लाये हैं" दूसरा सैनिक तल्खी से बोला|

"अब इस पर हस्ताक्षर करो, और हमें छुट्टी दो..." पहले सैनिक ने एक कागज़ देते हुए सख्ती से कहा|

उसके पिता ने कागज़ लिया और एक दूसरा कागज़ उसके हाथ में थमाया, सैनिक ने आश्चर्य से देखा और उस कागज़ को पढने लगा, वो एक पत्र था,

"पिताजी, मेरे कमरे में जो सैनिक साथ रहता है, वह दुश्मन देश का एजेंट है| वह मेरे मोबाईल से दस्तावेजों के चित्र भेजता है, आज फोटो हटाना भूल गया तो मैनें पकड़ लिया, उसने मुझे धमकी दी है कि मुझे फंसा देगा| मुझे कुछ हो जाये तो आर्मी को सच बता देना|"

पत्र पढ़ते हुए सैनिक सोचने लगा कि मृतक के कमरे के साथी ने ही तो उसे गोली मारी और उसके फ़ोन में दस्तावेजों के चित्र दिखाये थे, जो विदेशों में भेजे जा रहे थे|

उसने लाश पर लपेटे हुए कपड़े को खोला और गाड़ी से तिरंगा निकाल कर उसे ओढ़ा दिया, तब उसने देखा कि गोली सिर पर लगी थी और लहू जम गया था, उसने वहाँ हाथ रखा, लहू पाउडर की तरह था| उसने उसे अपने हाथ में लिया और उससे उसके पिता को फिर खुदको तिलक लगाया और अपने साथी को कहा

"चल...! अब होली खेलने की बारी हमारी है|"

(मौलिक और अप्रकाशित)

 

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 24, 2016 at 10:52pm

सुंदर कथा | बधाई स्वीकारे |

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on April 2, 2016 at 1:06pm

आदरणीया  राहिला जी, आदरणीय राहुल डांगी जी, आदरणीय शुभ्रांशु पाण्डेय जी, आप सभी का सादर धन्यवाद, आपकी लघुकथा का यह प्रयास ठीक लगा और आपने अपनी टिप्पणी द्वारा मेरा उत्साहवर्धन किया|

Comment by Shubhranshu Pandey on March 23, 2016 at 9:33pm

आदरणीय चन्द्रेश जी,

परिस्थितियों के वश में सही गलत का निर्धारण कठिन हो जाता है. सुन्दर कथा

सादर.

Comment by Rahul Dangi Panchal on March 21, 2016 at 1:23pm
भावुक कर दिया भैया जी आपने
।
जय जवान जय हिन्द जय भारत
Comment by Rahila on March 21, 2016 at 11:11am
ओह.. .कितना घिनौना सच!अपने ही देश से गद्दारी,लेकिन कब तक??जैसे यहां सच उजागर हुआ वैसे ही होता रहेगा । बहुत शानदार रचना आदरणीय सर जी!सादर

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