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सुख़नवर प्रेयसी के रूप के वर्णन में डूबा है (ग़ज़ल)

1222  1222  1222  1222

धरा   है  घूर्णन  में  व्यस्त,  नभ   विषणन  में  डूबा  है

दशा  पर  जग  की, ये  ब्रह्माण्ड  ही  चिंतन  में डूबा है

हर इक शय  स्वार्थ  में आकंठ  इस  उपवन में डूबी है
कली   सौंदर्य   में   डूबी,  भ्रमर   गुंजन   में   डूबा  है

बयां   होगी   सितम  की  दास्तां,  लेकिन  ज़रा  ठहरो
सुख़नवर   प्रेयसी   के   रूप   के   वर्णन  में   डूबा  है

उदर के आग  की  वो  क्या  जलन  महसूस  कर  पाए
जो  चौबीसों  घड़ी  ही  अनगिनत  व्यंजन  में  डूबा  है

संवारेगा  वो  किस्मत  देश  की,  बस  पेटियां  भर  ले
अभी  कुछ  दिन  हुए  आए, अभी  शोषण में  डूबा  है

न  मतलब  ईश्वर  तुझ  से, न  तुझ  से  वास्ता अल्लाह
ज़माना  सिर्फ आय और व्यय के विश्लेषण में  डूबा है

अधीन   उन्माद  के   उसके   हुए   हैं   चेतन-अवचेतन
जो क्षण भर को भी "जय" मदिरा भरे लोचन में डूबा है
==================================

जयनित कुमार मेहता

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Rahul Dangi Panchal on February 28, 2016 at 6:56am
सुन्दर लिखा है बधाई
Comment by जयनित कुमार मेहता on February 25, 2016 at 9:33pm

आदरणीय सुशील सरना जी, आपकी प्रतिक्रिया से मेरा श्रम सार्थक हुआ लगता है। बहुत-बहुत आभार।।

Comment by जयनित कुमार मेहता on February 25, 2016 at 9:31pm

आदरणीय मदन मोहन सक्सेना जी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।।

Comment by जयनित कुमार मेहता on February 25, 2016 at 9:31pm

आदरणीय कान्ता रॉय जी, रचना पर आपकी उपस्थिति व सराहना के लिए आपका आभारी हूँ।।

Comment by जयनित कुमार मेहता on February 25, 2016 at 8:35pm

आदरणीय मोहित मिश्रा जी, हार्दिक धन्यवाद आपको।।

Comment by Sushil Sarna on February 25, 2016 at 7:57pm

हर इक शय स्वार्थ में आकंठ इस उपवन में डूबी है
कली सौंदर्य में डूबी, भ्रमर गुंजन में डूबा है
बयां होगी सितम की दास्तां, लेकिन ज़रा ठहरो
सुख़नवर प्रेयसी के रूप के वर्णन में डूबा है
...... वाह वाह वाह आदरणीय बहुत ही सुंदर शब्दों,भावों और अलंकारों का संगम है आपकी ये मनोहारी प्रस्तुति ... दिल से बधाई स्वीकार करें।

Comment by Madan Mohan saxena on February 25, 2016 at 2:59pm

उदर के आग की वो क्या जलन महसूस कर पाए
जो चौबीसों घड़ी ही अनगिनत व्यंजन में डूबा है

न मतलब ईश्वर तुझ से, न तुझ से वास्ता अल्लाह
ज़माना सिर्फ आय और व्यय के विश्लेषण में डूबा है

वाह !

Comment by kanta roy on February 25, 2016 at 10:41am
धरा है घूर्णन में व्यस्त, नभ विषणन में डूबा है
दशा पर जग की, ये ब्रह्माण्ड ही चिंतन में डूबा है
------- वाह ! क्या खूबसूरत गजल कही है आपने आदरणीय जयनित जी , एक अलग ही अंदाज़ यहाँ नजर आया है । बधाई कबूल फरमाईयेगा ।

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