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कुछ छन्नपकैया सारछन्द (एक प्रयास)

छन्न पकैया छन्न पकैया,ओ.बी.ओ है बहतर
सारी बातें हो जाती हैं,यहाँ अदब में रहकर

छन्न पकैया छन्न पकैया, प्रभू की है माया
आज हुवा जाता है देखो,अपना ख़ून पराया

छन्न पकैया छन्न पकैया ,मंहगी बहुत दवाई
बिन इलाज के मर गए देखो,अपने बाबू भाई

छन्न पकैया छन्न पकैया,बढ़ा लो सब नाख़ून
इस दुनिया में लागू होगा,जंगलों का क़ानून

छन्न पकैया छन्न पकैया,वाणी अच्छी बोली
जब भी अपने लब खोलो तो बोलो सच्ची बोली

छन्न पकैया छन्न पकैया ,ग़ज़लें कहते कहते
सार छन्द में डूब न जाऐ ,"कबीर" बहते बहते

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 24, 2015 at 10:54am

आ० भाई समर जी एक बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई .

आ० भाई मिथिलेश जी की बात से मैं भी सहमत हूँ ...अन्यथा न लें ...

Comment by Samar kabeer on December 24, 2015 at 10:48am
जनाब शेख़ शहज़ाद उस्मानी साहिब,आदाब आपको रचना पसन्द आई इसके लिए शुक्रिया|

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2015 at 5:11am

आदरणीय समर कबीर जी, आपके छंद पढ़कर दिल खुश हो गया. इस बेहतरीन प्रस्तुति पर  आपको दिल से बधाई ....

एक निवेदन -//-------- प्रभु जी की है माया//

दूसरा निवेदन-//नाखून और क़ानून पर छंद नियम की दृष्टि से पुनर्विचार//

सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 23, 2015 at 7:47pm

वाह वाह आ० समर भाई जी ,आपने तो छंद लिखकर एक दम से चौंका दिया वो भी इतना शानदार आपको दिल से बधाई |

Comment by Ravi Shukla on December 23, 2015 at 12:36pm

आदरणीय समर साहब छंद पर आपकी उपस्थिति देखकर सुखद अनुभ‍ूति हुई बहुत बहुत बधाई आपको अन्‍य छंदो पर आपकी कलम का लाघव देखने को मिलेगा ऐसी आशा है । पुन: बधाई स्‍वीकार करें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 23, 2015 at 11:46am
सत्य कथ्य । बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत हार्दिक बधाई आपको आदरणीय समर कबीर साहब ।

कृपया ध्यान दे...

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