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होंठों पे जिनके दीप जलाने की बात है--- (ग़ज़ल)--- मिथिलेश वामनकर

221 2121 1221 212

 

होंठों पे जिनके दीप जलाने की बात है

सीने में उनके आग लगाने की बात है

 

झाड़ी के फैलते हुए हाथों को काट कर

कहते है सिर्फ बाग़ सजाने की बात है

 

क्या मुफ़लिसी वतन की सियासत से जाएगी?

ये परबतों पे दाल गलाने की बात है

 

अहले-वतन के काफिले होंगे गली-गली

बस इक दबा सवाल उठाने की बात है

 

फाकों में देखना है अगर मस्तियाँ तुम्हे

रोटी की गोल ढपली बजाने की बात है

 

जब तक चले, सफ़र में रहे, तो ये जिंदगी

ठहरी तो समझो मौत के आने बात है

 

खुद ही उतर के आएँगें तारे जमीन पर

बस आसमां से चाँद हटाने की बात है

 

कश्मीर पर हुजूर खुलेआम कह दिया

घर की अदावतें क्या बताने की बात है?

 

‘मिथिलेश’ मंच पे है मगर बोलता नहीं

परदा यहीं पे आज गिराने की बात है

 

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 5, 2015 at 4:22pm

आदरणीय केवल प्रसाद जी इस प्रयास की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार 

Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on November 5, 2015 at 3:02pm

अहले-वतन के....................सवाल उठाने की बात है

कश्मीर पर....................... बताने की बात है?

बहुत खूब !!!!!!

मिथिलेश वामनकर साहेब -------------------- बधाई|


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 5, 2015 at 1:45pm

आदरणीय मिथिलेश भाई , बेहतरीन गज़ल हुई है  शे र दर शे र मुबारकबाद कुबूल फरमायें ॥

क्या मुफ़लिसी वतन की सियासत से जाएगी?

ये परबतों पे दाल गलाने की बात है

अहले-वतन के काफिले होंगे गली-गली

बस इक दबा सवाल उठाने की बात है   -- ये शे र बहुत पसंद आये , हार्दिक बधाई आपको ।

Comment by मनोज अहसास on November 5, 2015 at 6:05am
नमस्कार सर
इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई

मौत वाले शेर में की टकण में छूट गया है
सादर
Comment by Abid ali mansoori on November 4, 2015 at 7:51pm

झाड़ी के फैलते हुए हाथों को काट कर

कहते है सिर्फ बाग़ सजाने की बात है

 

क्या मुफ़लिसी वतन की सियासत से जाएगी?

ये परबतों पे दाल गलाने की बात है!

वाह क्या बात है  आदरणीय मिथिलेश जी, वधाई आपको!

 

Comment by Shyam Narain Verma on November 4, 2015 at 5:08pm

इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक सादर बधाई कबूल करें 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 4, 2015 at 4:04pm

बहुत खूब .....

"अहले-वतन के काफिले होंगे गली-गली

बस इक दबा सवाल उठाने की बात है"  आ0 वामनकर भाईजी,  दिल से कही गज़ल के लिये दाद कुबूल करें.

 

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