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2212 122 2212 122

रुसवा किया जो यारी, तुमको मिली सज़ा है।
फ़तवा हुआ है ज़ारी, पढ़लो मिली सज़ा है।।

बदनामियों की ज़द में, वो आ गए तो सदमा।
भिजवा दिया है भारी, सिसको मिली सज़ा है।।

उनकी निगाह में थी, जो भी हाँ छवि तुम्हारी।
हटवा दिया है सारी, भटको मिली सज़ा है।।

चोरी से चाहने की, उसनें ख़ता रपट में।
लिखवा दिया तुम्हारी, भुगतो मिली सज़ा है।।

खुद चाँद ने तुम्हारे, हिस्से की रात सारी।
लिखवा दिया है कारी, सुनलो मिली सजा है।।


मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 18, 2015 at 10:30pm
आदरणीय डॉ गोपाल सर,सादर प्रणाम्।
आशीर्वाद देने के लिए नमन्।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 18, 2015 at 7:37pm

बढ़िया गजल है . गजल में रवानी है .

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 18, 2015 at 11:20am
आदरणीय जयनीत जी इस प्रयास पर आपकी प्रतिक्रिया, मेरी रचनाधर्मिता के लिए अमृत समान है।
सादर
Comment by जयनित कुमार मेहता on October 18, 2015 at 11:13am
वाह! बेहतरीन शिल्प.. बधाई आपको मिश्र जी..

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