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ज़रा सी बात पे फिर आज मुँह फुला आया-- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

 

1212--- 1122---1212---22

 

अगर नहीं था यकीं क्यों हलफ उठा आया

ज़रा सी बात पे फिर आज मुँह फुला आया

 

पहाड़ कौन सा टूटा, जो तेरी बातों में

मैं अपनी बात भी उसको अगर सुना आया

 

जो कब्र सा है अकेला, मज़ार सा तन्हां

वो मेरे घर का पता इस तरह बता आया

 

वे आदमी हैं, शिकायत मगर नहीं करते

बड़े जतन से चले तब ये सिलसिला आया

 

मैं रौशनी के भरोसे था अब तलक लेकिन

वो एक शाम मेरे नाम से लिखा आया

 

उसे जरा भी सलीका नहीं इबादत का

हवन किया भी तो अपना ही घर जला आया

 

तुम्हारे झूठ से कितना हुआ पशेमाँ मैं

तुम्हारे सच से भी परदा मगर उठा आया

 

वो हँस रहा था मेरे दर्द के मुक़ाबिल तो

मैं वाकिया था उसे आइना दिखा आया

 

वहाँ पे लौट के पंछी कभी नहीं आए

अजीब तौर से बरगद कोई हिला आया

 

नसीब आस का इतना बिगड़ गया कैसे ?

चमन के साथ में इस बार हादसा आया

 

जो शाम तक भी मसाइल पे कुछ न बोला तो

मैं आफ़ताब समंदर में ही गिरा आया

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 10, 2015 at 9:26pm

आदरणीय मिथिलेश भाई , लाजवाब ग़ज़ल कही है , सभी अशआर मे बातें बेहतरीन कही है , दिली मुबारक बाद स्वीकार करे ।
मैं अपनी बात भी उसे अगर सुना आया

वो मेरे घर पता इस तरह बता आया

ऊपर के दोनो मिसरे बे बह्र हो गये हैं , देख लीजियेगा

मैं रौशनी के भरोसे पे अब तलक लेकिन -- इस मिसरे को - मैं रौशनी के भरोसे था अब तलक लेकिन   , ऐसा करना उचित होगा ऐसा मुझे लगता है ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 10, 2015 at 8:30pm

वाह बहुत सुन्दर मतला 

मैं अपनी बात भी उसे अगर सुना आया------यहाँ उसको आना चाहिए 

मैं अपनी बात भी उसको  अगर सुना आया

वो मेरे घर पता इस तरह बता आया----घर का पता 

उसे जरा भी सलीका नहीं इबादत का

हवन किया भी तो अपना ही घर जला आया---बहुत खूब 

वो हँस रहा था मेरे दर्द के मुक़ाबिल तो

मैं वाकिया था उसे आइना दिखा आया---शानदार 

सुन्दर ग़ज़ल हुई मिथिलेश भैया बहुत बहुत बधाई 

 

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 10, 2015 at 6:19pm
हमेशा की तरह लाजवाब ग़ज़ल मिथिलेश भाई बधाई स्वीकार करें
और ये भी गौर करें
वें? तन्हां? तुम्हारें?
Comment by Ravi Shukla on September 10, 2015 at 5:53pm

अादरणीय मिथिलेश जी सुन्‍दर ग़ज़ल के लिये बधाई स्‍वीकार करें सभी शेर अच्‍छे हुए है पर अाखिरी शेर हमें बहुत पसंद आया । दिली दाद कुबूल करें ।

Comment by Shyam Narain Verma on September 10, 2015 at 5:42pm
बहुत खूब ! इस सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें ।
Comment by दिनेश कुमार on September 10, 2015 at 11:35am
वाह वाह बहुत खूब आदरणीय भाई मिथिलेश जी। बहुत बहुत मुबारक। एक से बढ़कर एक अशआर हुए हैं। वाह

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