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ज़रा सी बात पे फिर आज मुँह फुला आया-- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

 

1212--- 1122---1212---22

 

अगर नहीं था यकीं क्यों हलफ उठा आया

ज़रा सी बात पे फिर आज मुँह फुला आया

 

पहाड़ कौन सा टूटा, जो तेरी बातों में

मैं अपनी बात भी उसको अगर सुना आया

 

जो कब्र सा है अकेला, मज़ार सा तन्हां

वो मेरे घर का पता इस तरह बता आया

 

वे आदमी हैं, शिकायत मगर नहीं करते

बड़े जतन से चले तब ये सिलसिला आया

 

मैं रौशनी के भरोसे था अब तलक लेकिन

वो एक शाम मेरे नाम से लिखा आया

 

उसे जरा भी सलीका नहीं इबादत का

हवन किया भी तो अपना ही घर जला आया

 

तुम्हारे झूठ से कितना हुआ पशेमाँ मैं

तुम्हारे सच से भी परदा मगर उठा आया

 

वो हँस रहा था मेरे दर्द के मुक़ाबिल तो

मैं वाकिया था उसे आइना दिखा आया

 

वहाँ पे लौट के पंछी कभी नहीं आए

अजीब तौर से बरगद कोई हिला आया

 

नसीब आस का इतना बिगड़ गया कैसे ?

चमन के साथ में इस बार हादसा आया

 

जो शाम तक भी मसाइल पे कुछ न बोला तो

मैं आफ़ताब समंदर में ही गिरा आया

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 18, 2015 at 12:39am

आदरणीय नीरज जी हार्दिक आभार आपका 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 18, 2015 at 12:38am

आदरणीय विजय निकोर सर, ग़ज़ल की सराहना और मुखर अनुमोदन हेतु आभार आपका. सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 18, 2015 at 12:37am

आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर, मुखर अनुमोदन हेतु आभार आपका. सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 18, 2015 at 12:37am

आदरणीय समर कबीर जी, बढ़िया मिसरा सुझाने और मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार.

Comment by Neeraj Neer on September 13, 2015 at 5:26pm

वाह बेहतरीन 

Comment by vijay nikore on September 13, 2015 at 1:24pm

 //

उसे जरा भी सलीका नहीं इबादत का

हवन किया भी तो अपना ही घर जला आया

तुम्हारे झूठ से कितना हुआ पशेमाँ मैं

तुम्हारे सच से भी परदा मगर उठा आया//

सारी गज़ल बार-बार पढ़ी, बहुत ही खूबसूरत ! बधाई, आदरणीय मिथिलेश जी।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 11, 2015 at 8:50pm

वो हँस रहा था मेरे दर्द के मुक़ाबिल तो

मैं वाकिया था उसे आइना दिखा आया------ गजब ,गजब ,गजब  आप आदरणीय  बस कमाल है  .

 

Comment by Samar kabeer on September 11, 2015 at 6:27pm
"इबादतों का ज़रा भी नहीं सलीक़ा उसे"

क्या ये मिसरा उचित लगता है ?

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 11, 2015 at 12:05pm

आदरणीय बड़े भाई धर्मेन्द्र जी, आपका अनुमोदन सदैव आश्वस्तकारी हुआ करता है.  ग़ज़ल की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार. बहुत बहुत धन्यवाद, सादर 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 11, 2015 at 11:48am
बहुत ख़ूब आदरणीय मिथिलेश जी, ख़ूबसूरत अश’आर से सजी ग़ज़ल के लिए दाद कुबूल कीजिए।

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