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बस तुम नहीं आती

खोल रखे है मैंने

खिड़कियाँ और सभी दरवाजे

भीतर आते हैं

धूप , चाँदनी ,

निशांत समीर ,

दोपहर के गरम थपेड़े ,

पूस की  शीत लहर ,

बरखा बूंदे

तमस, प्रकाश

पुष्प सुवास, उमसाती गँधाती अपराह्न की हवा

और सभी कुछ

अपनी मर्जी से

और अक्सर उतर आता है

खाली आकाश भी

बस तुम नहीं आती

कितने बरस बीत गए

पर तुम नहीं आती

खोल रखे होंगे

तुमने भी शायद

खिड़कियाँ और दरवाजे

..... नीरज कुमार नीर

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Neeraj Neer on August 4, 2015 at 4:17pm

आदरणीय  शरदिंदु मुख़र्जी साहब आपकी इस प्रेरणास्पद प्रतिक्रिया हेतू आपका आभार ... 

Comment by Neeraj Neer on August 4, 2015 at 4:15pm

आदरणीय  Mohan Sethi 'इंतज़ार' आपका दिल से शुक्रगुजार हूँ .... 

Comment by Neeraj Neer on August 4, 2015 at 4:15pm

आपका हार्दिक भर आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी . 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on August 4, 2015 at 1:21pm
आदरणीय सौरभ जी के "कौतुक" का सूत्र थामकर मैं कहना चाहूंगा कि यदि यह मेरी रचना होती तो अंतिम पंक्तियों का कुछ इस प्रकार होना सम्भव था:
'तुम अपनी खिड़की और दरवाजों को बंद रखो
जब तक चाहो
मैं आवारा पवन बनकर
दस्तक देता रहूंगा'

आपकी रचना ने मुझे "कौतुक" में शामिल होने के लिए प्रेरित किया यह रचना की सफलता का द्योतक है आदरणीय नीरज नीर जी. साधुवाद. सादर.
Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on August 4, 2015 at 8:17am

आदरणीय नीरज नीर जी इस भावपूर्ण रचना के लिये बधाई ...बहुत ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति 

Comment by pratibha pande on August 3, 2015 at 8:27pm
बहुत ख़ूबसूरत रचना बधाई आपको आ० नीरज जी
Comment by Neeraj Neer on August 2, 2015 at 8:25pm

आपका हार्दिक आभार आदरणीय सौरभ जी कविता को समर्थन देने हेतू .... 

आपका आभार इस सलाह हेतू ..... 

मैं ऐसा ही करने की कोशिश करूंगा ... 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 2, 2015 at 8:10pm

आदरणीय नीरज नीर जी, अभी-अभी आपकी एक बहुत ही कोमल कविता पढ़ी है, गुड़हुल के फूल और लड़कियों को लेकर. अभी प्रस्तुत कविता को देख रहा हूँ. वियोग-विह्वलता को अच्छे शब्द मिले हैं. बधाई स्वीकर करें.

आखिरी कुछ पंक्तियों को कुछ यों करना उचित हो सकता है क्या ? --

खोल रखे हैं उधर
क्या तुमने भी
खिड़कियाँ और दरवाजे ? 

ऐसे प्रश्न का मतलब क्यों है, इसे आप समझेंगे ही. इस कविता को पढ़ कर बन गयी भावदशा से उपजा यह कौतुक मात्र है. अन्यथा न लीजियेगा.

शुभेच्छाएँ

Comment by Neeraj Neer on August 2, 2015 at 7:56pm

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय मिथिलेश जी 

Comment by Neeraj Neer on August 2, 2015 at 7:56pm

हार्दिक आभार आपका आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव साहब ॥ 

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