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पढाया गया था-

‘मैन इज ए सोशल एनिमल’

हमने भी रट लिया

औरों की तरह

पर मन नहीं माना

कहाँ पशु और कहाँ हम

पर एक दिन जाना

पक्षी और पशु

दोनों ही बेहतर है

हम जैसे मानव से

क्योंकि 

भूख सबको लगती है 

पर पक्षी

न घुटने टेकता है

और न हाथ फैलाता है

रोता भी नहीं

गिडगिडाता भी नहीं  

हाथ तो मित्र

पशु भी नहीं फैलाते  

बल्कि वे भौंकते है

या फिर गुर्राते है

पर हम -----?

हम तो मानव हैं 

प्राणि शिरोमणि

हम क्या करते हैं

क्या कर सकते है

वह भी नहीं जानता


(मौलिक्व अप्रकाशित )

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 8, 2015 at 2:05am

बात की बात में व्यंग्य हो गया ! आदरणीय हार्दिक धन्यवाद ..

शुभ-शुभ

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 2, 2015 at 7:10pm

आदरणीय विजय शकर जी के विचार से सहमत आदरणीय गोपाल नारायण जी ... कविता का विषय बिलकुल नया!

Comment by maharshi tripathi on July 2, 2015 at 5:05pm

हम तो मानव हैं 

प्राणि शिरोमणि

हम क्या करते हैं

क्या कर सकते है

वह भी नहीं जानता,,,,,,,,,,,वाह !! यही सब बयां कर रहा है |बधाई आ. डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर जी |

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on July 2, 2015 at 2:34pm

वाह आदरणीय यथार्थ कहा आपने! मनुष्य  प्राणी शिरोमणि तब तक नही जब तक अपने जीवन का भार वह उतर न लें!नमन!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 2, 2015 at 2:23pm

आदरणीय गोपाल सर ..जबर दस्त व्यंग्य के माध्यम से आपने सारी पोल खोल दी ..हमें तो जानवरों से सीखना चाहिए ..इस सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर 

Comment by kanta roy on July 2, 2015 at 9:04am
वाह !!!! मन को सुखद लगा मन आनंद लगा स्वंय को प्राणी शिरोमणि पाकर । सच ही है हम है घुटने टेकने वाला वक्त के आगे चंद रोटी की भूख ..? नहीं हमारी भूख बहुत बडी है ... अनंत तक ... इसलिए हम प्राणी शिरोमणि ही है .... बेहद उम्दा रचना आदरणीय डा. गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी ... बधाई

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 1, 2015 at 2:39pm

गज़ब का व्यंग्य 

बहुत बढ़िया कविता 

आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर  कविता बहुत सुन्दर हुई है, हार्दिक बधाई, सादर.....

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 30, 2015 at 11:55pm
मनुष्य की यही तो विशेषता है कि वह हर चीज़ का उपयोग करना जनता है, पशु -पक्षी क्या , वह मनुष्य का भी इस्तेमाल कर लेता है। भोजन के लिए पशु- पक्षी एक निर्धारित उद्योग करते हैं , सारा ज्ञान-विज्ञान उसी से बचने और बिना उद्योग के भोजन और सुविधाएं प्राप्त करना होता है।
आदरणीय डॉo गोपाल नारायण जी , कविता बहुत सुन्दर है , बधाई , सादर।
Comment by Shyam Narain Verma on June 29, 2015 at 11:46am

सुंदर भाव से संजोयी रचना पर बधाई स्वीकारें

 सादर...........

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