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उनके बाहों की सौग़ात मिली

उनके बाहों की सौग़ात मिली
इक मुद्दत पे ऐसी रात मिली

जाने मेरे हक़ का था वो पल
या मुझको कोई खैरात मिली

रिमझिम रिमझिम मेरी आँखों से
उसकी याद लिए बरसात मिली

सोचा क्या था क्या पाया मैंने
टूटे सपनों की बारात मिली

जिनको सज़दे में माँगा ता-उम्र
उनसे कुछ पल कि मुलाक़ात मिली

जब सोचा की अब जीतेंगे हम
बस उस पल ही मुझको मात मिली

© परी ऍम. 'श्लोक'

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 802

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Comment by Pari M Shlok on July 6, 2015 at 12:26pm
मिथिलेश वामनकर जी आपका शुक्रिया बहुत बहुत
Comment by Pari M Shlok on July 6, 2015 at 12:25pm
Saurabh Pandey जी आभारी हूँ

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 6, 2015 at 3:25am

बढिया प्रयास हुआ है, आदरणीया .. बधाई ..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on June 28, 2015 at 3:06am

सुन्दर प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

Comment by Pari M Shlok on June 20, 2015 at 12:35pm
narendrasinh chauhan जी शुक्रिया आदरणीय
Comment by narendrasinh chauhan on June 20, 2015 at 11:52am

खूब सुन्दर रचना

Comment by Pari M Shlok on June 20, 2015 at 9:13am
maharshi tripathi जी शुक्रिया सर
Comment by maharshi tripathi on June 19, 2015 at 8:12pm

सुन्दर आ. Pari M Shlok जी ,,,बधाई आपको |

Comment by Pari M Shlok on June 19, 2015 at 5:26pm
kanta roy जी शुक्रिया बेहद आदरणीय
Comment by kanta roy on June 19, 2015 at 5:22pm
जब सोचा की अब जीतेंगे हम
बस उस पल ही मुझको मात मिली...... वाह !! बहुत खूब लिखा है आपने यह

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