For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

नज़र झुकाई जो इक बार तो उठा न सके- ग़ज़ल

1212 1122 1212 112/22

वो मेरे सामने आने पे मुस्कुरा न सके

नज़र झुकाई जो इक बार तो उठा न सके

 

हज़ार कोशिशें की रश्क़ तो छुपा न सके

मगर हँसी में मेरी बात भी उड़ा न सके

 

उन्होंने जिक्र मेरा छेड़ तो दिया सरे बज़्म

वही बातें मेरे होते वो दोहरा न सके

 

हर एक सम्त से नज़रें उठीं हमारी तरफ

कि कहते कहते भी वो हालेदिल सुना न सके

 

बस एक रोज़ की थी ज़िन्दगानी फूलों की

वो बदनसीब रहे जो चमन सजा न सके

 

न पूछिये मेरी बेचारगी का आलम, आह!

कि आते आते भी ये अश्क़ बाहर आ न सके

मौलिक अप्रकाशित

Views: 698

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 4, 2015 at 11:48am

बहुत खूब सूरत ग़ज़ल है शिज्जू भैया ,आ० समीर भाई जी की बात से सहमत हूँ उन्होंने मिसरों को हल भी बता दिया जो स्वागत योग्य है 

)"वही बातें मेरे होते वो दोहरा न सके"---मगर  वो लफ़्ज मेरे होते  दोहरा न सके ..ऐसे भी  कर सकते हैं 

बस एक रोज़ की थी ज़िन्दगानी फूलों की

वो बदनसीब रहे जो चमन सजा न सके---लाजबाब 

बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई दिल से दाद कबूलिये  

Comment by Samar kabeer on June 4, 2015 at 10:55am
जनाब शिज्जु "शकूर" जी,आदाब,बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने ,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ,दो मिसरों की तरफ़ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा :-

(1)"वही बातें मेरे होते वो दोहरा न सके"

इस मिसरे में लय बाधित हो रही है ,इसे इस तरह कर लें तो बहतर होगा :-

"प मेरे सामने बातें वो दोहराना न सके"

(2)" कि आते आते भी ये अश्क़ बाहर आ न सके"

इस मिसरे में भी लय बाधित हो रही है,इसे इस तरह कर लें :-

"कि आते आते भी बाहर ये अश्क आ न सके"
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 3, 2015 at 11:12pm

अहहाहा! दिल बस गुनगुनाये जा रहा है!रंग चढ़ गया है इस गजल का! लाजवाब! लाजव़ाब!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 3, 2015 at 11:07pm

बहुत ही दिलकश गजल हुयी है आदरणीय शिज्जू सर! अभिनन्दन!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 3, 2015 at 10:23pm

आ० शिज्जू भाई

आपकी गजलो से ही सीख रहा हूँ. बेहतरीन प्रस्तुति .

Comment by maharshi tripathi on June 3, 2015 at 7:25pm

बस एक रोज़ की थी ज़िन्दगानी फूलों की

वो बदनसीब रहे जो चमन सजा न सके

  न पूछिये मेरी बेचारगी का आलम, आह!

कि आते आते भी ये अश्क़ बाहर आ न सके,,,,,,वाह  ,,प्रणाम आपको आ. शिज्जु "शकूर" जी ,,कमाल की गजल है |

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
yesterday
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Monday
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेतुझे याद किया था हमने ... "क्या...तुम्हारे मन के द्वार…See More
Monday
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Sunday
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Friday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Friday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Friday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Jul 21

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय अशोक भाईजी, वर्षा ऋतु, विशेषकर सावन मास, के नम क्षणों का रागात्मक वर्णन रोचक बन पड़ा है.…"
Jul 20
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Jul 18
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Jul 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service