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वो पेड़ : लघु कथा : हरि प्रकाश दुबे

“बहन रो क्यों रही हो !”

“मेरा बेटा.... कहकर, वह अभागी माँ  और जोर –जोर से रोने लगी !”

“सखी, पहले ये आँसू पोंछ लो,..अब बताओ, हुआ क्या था ?”

“लाख समझाया , पर नहीं माना, गलत लोगों का साथ , पैसे की भूख, वो और उसके दोस्त रोज आरी लेकर निकल जाते और अपने दादा - परदादा से भी पुराने जमाने के पेड़ काटकर बेच आते, अरे कितनी बार कहा था यह प्रकृति हमारी माँ है, ये पेड़ हमारे जीवनदाता  ! “

“ फिर !”

“फिर क्या ..  एक दिन  उन्होंने वो बड़ा सा पेड़ काटा और वो पेड़, मेरे  बेटे पर ही गिर गया... !”

 

“मौलिक व अप्रकाशित”

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 5, 2015 at 9:22am

अच्छी लघुकथा, आदरणीय हरिप्रकाश जी. बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 4, 2015 at 10:55pm

अच्छी लघु कथा है विषय अच्छा चुना है आपने हार्दिक बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on May 4, 2015 at 12:10pm
इस अच्छी लघु कथा के लिए बधाई, आदरणीय

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 4, 2015 at 12:00pm

सोच वास्तव में अच्छी है. लेकिन जाने क्यों बहुत कुछ सामने आने से रह गया जैसा लग रहा है.

प्रस्तुत करने के पूर्व रचना को थोड़ा समय देना था, आदरणीय हरि भाईजी. या, संभव है मैं ही नहीं समझ पा रहा हूँ.

फिर भी आप इस रचना को एक बार फिर से देखियेगा जरूर..

शुभेच्छाएँ.

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 4, 2015 at 10:10am

कई सवाल खड़े कर दिये आपने ....बढ़िया कथा ...सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 4, 2015 at 8:28am
आदरणीय हरिप्रकाश भाई जी अच्छी लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई
Comment by Omprakash Kshatriya on May 3, 2015 at 9:05pm

वास्तव  में आप की लघुकथा कुछ सोचने को मजबूर करती है . बधाई . अच्छी लघुकथा .

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