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मेरे दिल के हर इक कोने से पोशीदा अलम निकले- शिज्जु शकूर

1222/1222/1222/1222

मेरे दिल के हर इक कोने से पोशीदा अलम निकले

सो जो अल्फ़ाज़ निकले दिल से बाहर वो भी नम निकले

 

गुजश्ता* वक्त का कोई निशाँ बाकी नहीं लेकिन                                     *गुज़रा हुआ

उसी की जुस्तजू में दिल से खूँ ही दम ब दम निकले

 

किया जिस वास्ते किस्मत से शिकवा मैंने ऐ ग़मख़्वार

हकीकत में वो सारे ज़ख्म तो तेरे सितम निकले

 

किसी खूँख्वार* को मतलब नहीं ईमानो दीं से कुछ                               *रक्त पिपासु

तू आँखें खोल के देखे तो फिर तेरा वहम निकले

 

मैं ख़ूगर* इस कदर तन्हाइयों का हो गया यारो                                   *आदी

बड़ी मुश्किल से बाहर आज मेरे ये कदम निकले

 

वफा तुमने निभाई जो रवायत तोड़कर ऐ दोस्त

तुम्हारे वास्ते हर कायदे को भूल हम निकले

 

-मौलिक व अप्रकाशित

 

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Comment by गिरिराज भंडारी on May 2, 2015 at 6:20pm

क्या बात है ! आदरणीय  शिज्जु  भाई , हर शे र जानदार  है , और सुधारे हुये शे र भी पहले से जियादा अच्छे हुये हैं ॥ आपको   हृदय से बधाइयाँ  पूरी गज़ल के लिये ॥

Comment by MAHIMA SHREE on May 2, 2015 at 5:16pm

मेरे दिल के हर इक कोने से पोशीदा अलम निकले

सो जो अल्फ़ाज़ निकले दिल से बाहर वो भी नम निकले ...बहुत खूब ..

बहुत खूबसूरत .गज़ल है..बहुत बहुत बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 2, 2015 at 3:30pm

जनाब समर कबीर साहब सबसे पहले तो आपका बहुत बहुत शुक्रिया। जी आपने हरम के जो मतलब बताये वो मुझे पता थे लेकिन मैंने कई उस्ताद शुअरा की किताबों में हरम को मस्जिद के अर्थों में प्रयुक्त होते देखा है, हालाँकि ये कितना सही था ये मुझे नही मालूम,आपका बहुत बहुत शुक्रिया। दूसरे हर्फ़े इजाफ़त को लेकर मैं अब भी मुतमईन नहीं हूँ चूँकि आपका इल्मो तज्रिबा दोनों जियादा है इसलिये आपका सुझाव सर आँखों पर दोनों इस्लाह कुबूल करता हूँ और जल्द ही दोनो मिसरे बदल के फिर पोस्ट करता हूँ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 2, 2015 at 3:05pm

आदरणीय उमेश जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 2, 2015 at 3:04pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर आपका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by Samar kabeer on May 2, 2015 at 3:00pm
जनाब शिज्जू "शकूर" जी,आदाब,बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |

मतले का ऊला मिसरा:-

"मेरे गोशा ए दिल से लफ़्ज़ जो निकले वो नम निकले"

सही शब्द है गोश-ए-दिल |

"किसी खूँख्वार* को मतलब नहीं ईमानो दीं से कुछ *रक्त पिपासु
वगरना देखता वो शह्र में कितने हरम* निकले *मस्जिद"

इस शैर में "हरम" का मतलब आपने मस्जिद लिखा है जबकि "हरम" का सही मतलब है "काबे की चार दीवारी" जहाँ जानदार का मारना हराम है ,दूसरा मतलब "शरीफ़ों का ज़नान ख़ाना" तीसरा मतलब " मनकूहा बीवी" ,चौथा मतलब है "कनीज़" |
Comment by umesh katara on May 2, 2015 at 11:32am

गुजश्ता* वक्त का कोई निशाँ बाकी नहीं लेकिन                                     *गुज़रा हुआ

उसी की जुस्तजू में दिल से खूँ ही दम ब दम निकले
----------------वाहहहहहहहहह  जबरदस्त साहेब 

Comment by Dr. Vijai Shanker on May 2, 2015 at 10:13am
किसी खूँख्वार* को मतलब नहीं ईमानो दीं से कुछ
वगरना देखता वो शह्र में कितने हरम* निकले ॥
बहुत खूब , आदरणीय शिज्जु शकूर जी, बधाई, बहुत बहुत , सादर।

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