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नसरी नज़्म :- "शहीद"

उस शहीद का तसव्वुर
ज़ह्न से नहीं निकलता
शर्म से सर झुका हुवा है
दर्द दिल में छुपा हुवा है
इस तसव्वुर ने मेरे रोज़-ओ- शब
मेरे अपने नहीं रहने दिये
मैं उसी का होकर रह गया हूँ
कहीं खो गया हूँ
उसका रुत्बा मुझे झंझोड़ता है
सूखे ज़ख़्मों को फिर उधेड़ता है
मेरे अंदर सदा लगाता है
मेरे अहसास को जगाता है
मुझ से कोई सवाल है उसका
इश्क़ भी ला ज़वाल है उसका
मुझसे इतना ही चाहता है वो
उसकी क़ुर्बानी को मैं आम करूँ
और जिहालत का क़त्ल-ए-आम करूँ
उसके मक़सद को आगे ले जाऊँ,
इस तसव्वुर में इक दरार पड़ी
उस के अंदर से इक ख़याल आया,
मैं तो शाईर हूँ और मेरे लिये
यह क़लम ही है मेरा सरमाया,
और मैने उठा लिया है क़लम
उस तसव्वुर को में रक़म कर दूँ
सारे लोगों का दर्द कम कर दूँ
उसका मक़सद है अब मिरा मक़सद
अपने लफ़्ज़ों से मैं वो काम करूँ
और सच्चाई को मैं आम करूँ,
और फिर एक दिन यह हो जाए
इसी मक़सद में जाँ चली जाए,
एक हसरत है पूरी हो जाए
लोग मुझ को भी इक शहीद कहें


"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 15, 2015 at 6:49pm

आदरणीय समर कबीर भाई , आपकी गद्य कविता भी बहुर सुन्दर भाव पूर्ण हुई है , आपको हार्दिक बधाई ॥ बस आखरी लाइन ऐसा लगता है वो बात नही कह पाई जो आप कहना चाहते थे ।

लोग मुझ को भी इक शहीद कहें  --    क्यों कि सारा जीवन भी अगर कोई शहीद की हसरतों को पूरा करने मे लगा दे तो भी कोई शहीद कैसे कहा जायेगा ?

'' मेरा नाम भी शहीद के नाम से ऐसा जुड जाये कि , उनकी  यादें मेरे नाम के बिना अधूरा हो जाये ''  शायद ऐसा कुछ सही लगे ॥

सोच के देखियेगा ॥

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 15, 2015 at 6:15pm
अपने लफ़्ज़ों से मैं वो काम करूँ
और सच्चाई को मैं आम करूँ,
बहुत खूब, खूबसूरत नज्म , आदरणीय समर कबीर साहब, नमस्कार , बहुत बहुत बधाई, सादर।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 15, 2015 at 6:03pm

आ 0 समर कबीर जी

बहुत उम्दा लिखा आपने . नज्म भावों से भरी है . सादर .

कृपया ध्यान दे...

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