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बह गये तूफान में वो जा किनारे से लगे- ग़ज़ल

2122/ 2122/ 2122/ 212

बह गये तूफान में वो जा किनारे से लगे

लड़ने वाले ही मगर सब बेसहारे से लगे

 

हार के बाहर हुये वो चैन की अब साँस लें

जीतने की जो कहें मुझको वो हारे से लगे

 

बारहा मेरे करीब आकर ठहर जाते हैं यूँ

ये हवादिस मेरी किस्मत के इशारे से लगे

 

लुट गया सामां सफर में हर मुसाफिर का यहाँ

लोग भी बेआस बेबस गम के मारे से लगे

 

कागज़ों पर है नुमायाँ हाले दिल मेरा “शकूर”

राख से कुछ हर्फ़ कुछ उनमें शरारे से लगे

 

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 14, 2015 at 1:12pm

आ0 शिज्जु भाई जी, कमाल की ग़ज़ल हुई है.  तहे दिल से दाद कुबूल  करे.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 14, 2015 at 7:52am
आदरणीय शिज्जु भाई जी आजकल बेहतरीन ग़ज़लें आ रही है आपकी। ये ग़ज़ल भी कमाल की हुई है। एक एक अशआर पर दिल से दाद कुबूल फरमाये।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 13, 2015 at 10:20pm

बारहा मेरे करीब आकर ठहर जाते हैं यूँ

ये हवादिस मेरी किस्मत के इशारे से लगे---बहुत उम्दा शेर 

हमेशा की तरह सुन्दर ग़ज़ल तहे दिल से बधाई लीजिये 

 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 13, 2015 at 8:34pm

सुन्दर गजल पर हार्दिक बधाईया आदरणीय!

Comment by Shyam Narain Verma on April 13, 2015 at 1:28pm

खुबसूरत ग़ज़ल हुई है |सादर अभिनन्दन |

Comment by narendrasinh chauhan on April 13, 2015 at 12:40pm

खुबी सुन्दर ग़ज़ल

Comment by savitamishra on April 13, 2015 at 10:44am

बहुत बढ़िया गजल

Comment by Samar kabeer on April 13, 2015 at 10:33am
जनाब शिज्जू "शकूर" जी,आदाब,
"झूट इसमें कुछ नहीं है,सच ही कहते हैं जनाब
आप के अशआर हम को इतने प्यारे से लगे "

अमदा और ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 13, 2015 at 8:42am

आदरणीय शिज्जु भाई , हमेशा की तरह ये ग़ज़ल भी आपकी लाजवाब है , तहे दिल से मुबारक बाद कुबूल करें ।

दो मिसरों मे विचार और किया जा सकता है , ऐसा मुझे लगता है  --

बह गये तूफान में वो जा किनारे से लगे    -- बह गये तूफान में वो  तो  किनारे से लगे

लड़ने वाले ही मगर सब बेसहारे से लगे  

कागज़ों पर है नुमायाँ हाले दिल मेरा “शकूर”

राख से कुछ हर्फ़ कुछ उनमें शरारे से लगे           राख से कुछ हर्फ़ बस उनमें शरारे से लगे    ( कुछ दो बार अच्छा नहीं लग रहा है )

विचार करके देख लीजियेगा ॥

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 12, 2015 at 10:52pm
बह गये तूफान में वो जा किनारे से लगे
लड़ने वाले ही मगर सब बेसहारे से लगे
बहुत खूब , आदरणीय शिज्जु शकूर जी , बधाई , सादर।

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