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ग़ज़ल : इक दिन बिकने लग जाएँगे बादल-वादल सब

इक दिन बिकने लग जाएँगे बादल-वादल सब

दरिया-वरिया, पर्वत-सर्वत, जंगल-वंगल सब

 

पूँजी के नौकर भर हैं ये होटल-वोटल सब

फ़ैशन-वैशन, फ़िल्में-विल्में, चैनल-वैनल सब

 

महलों की चमचागीरी में जुटे रहें हरदम

डीयम-वीयम, यसपी-वसपी, जनरल-वनरल सब

 

समय हमारा खाकर मोटे होते जाएँगे

ब्लॉगर-व्लॉगर, याहू-वाहू, गूगल-वूगल सब

 

कंकरीट का राक्षस धीरे धीरे खाएगा

बंजर-वंजर, पोखर-वोखर, दलदल-वलदल सब

 

जो न बिकेंगे पूँजी के हाथों मिट जाएँगे

पाकड़-वाकड़, बरगद-वरगद, पीपल-वीपल सब

 

आज अगर धरती दे दोगे कल वो माँगेंगे

अम्बर-वम्बर, सूरज-वूरज, मंगल-वंगल सब

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(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 18, 2015 at 4:53pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. गोपाल नारायन जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 18, 2015 at 4:51pm
तह-द-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ, आ. बागी जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 18, 2015 at 4:49pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. मिथिलेश जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 18, 2015 at 4:47pm
शुक्रिया वीनस भाई
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 18, 2015 at 4:47pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. राजेश कुमारी जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 18, 2015 at 4:45pm
शुक्रिया आ. उमेश जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 18, 2015 at 4:43pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. समर साहब।
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 18, 2015 at 4:41pm
तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आ. गिरिराज जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 18, 2015 at 4:40pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. विजय शंकर जी
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 15, 2015 at 4:44pm

आ० धर्मेन्द्र जी

क्या कहने  ! सुन्दर - वुन्दर , गजल वजल सब

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