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चंचल नदी

बाँध के आगे

फिर से हार गई

बोला बाँध

यहाँ चलना है

मन को मार, गई

 

टेढ़े चाल चलन के

उस पर थे

इल्ज़ाम लगे

उसकी गति में

थी जो बिजली

उसके दाम लगे

 

पत्थर के आगे

मिन्नत सब

हो बेकार गई

 

टूटी लहरें

छूटी कल कल

झील हरी निकली

शांत सतह पर

लेकिन भीतर

पर्तों में बदली

 

सदा स्वस्थ

रहने वाली

होकर बीमार गई

 

अपनी राहें

ख़ुद चुनती थी

बँधने से पहले

अब तो सबकुछ

पूछ रही वो

रुक जाए, बह ले

 

आजीवन वो

उसी राह से

हो लाचार, गई

---------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 12, 2015 at 1:00pm

बहुत बहुत धन्यवाद, आ. जवाहर लाल जी

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on April 10, 2015 at 7:44pm

बेहतरीन भाव के साथ स्त्री की तुलना नदी से कर के आपने बहुत कुछ कह दिया है नारी की विडम्बना, अबला जीवन हाय .....

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 10, 2015 at 5:47pm
बहुत बहुत धन्यवाद आशुतोष मिश्र जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 10, 2015 at 5:44pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. महर्षि त्रिपाठी जी
Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 10, 2015 at 3:54pm

आदरणीय धर्मेन्द्र जी इस शानदार नव गीत के लिए हार्दिक बधाई सादर 

Comment by maharshi tripathi on April 9, 2015 at 5:55pm

नारी को नदी के रूप में लाकर ,,उसकी विवशता को क्या खूब उजागर किय है ,,,बहुत बहुत बधाई आ. धर्मेन्द्र कुमार सिंह  जी |

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 9, 2015 at 12:30pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. गिरिराज जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 9, 2015 at 12:29pm
बहुत बहुत धन्यवाद आ. राजेश कुमारी जी।
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 9, 2015 at 12:29pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. मीना जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 9, 2015 at 12:28pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. निधि अग्रवाल जी

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