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मै तो बलिहारी............'जान' गोरखपुरी

२१२ २२१२ १२१२

मै तो बलिहारी,अमीर हो गया

इश्क़ में रब्बा फकीर हो गया

***

मेरे रांझे का मुझे पता नही

बिन देखे ही मै तो हीर हो गया

**

उसके जलवे यूँ सुने कमाल के

दिलको किस्सा उसका तीर हो गया

***

शिवशिवा घट-घट मुझे पिलाओ अब

तिश्न मै वो गंग नीर हो गया

**

उसको पहनूं धो सुखाऊँ रोज मै

लाज मेरी अब वो चीर हो गया

***

गाऊँ कलमा मै सुनाऊँ दर-ब-दर

‘’जान’’ज्यूँ मै कोई पीर हो गया

******************************************

मौलिक व अप्रकाशित (c) ‘जान’ गोरखपुरी

******************************************

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Comment

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Comment by Shyam Mathpal on April 2, 2015 at 7:51pm

आदरणीय कृष्ण मिश्रा जी.

दिलकश व दिल को छूने वाली रचना. हार्दिक बधाई .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 2, 2015 at 4:59pm

प्रिय कृष्ण

कोई किसी के बलिहारी जाता है जैसे बलि जाऊं मैं तात तुम्हारे .पर यही किसके आप बलिहारी है यह्लुप्त है  दूसरे  यह शब्द उला  में फिट भी नहीं हो रहा . उला और सानी में रब्त भी नहीं है . एक और अमीरी का जश्न है दूसरी और फकीरी  की घोषणा . मैं भी नौसिखिया ही हूँ पर मुझे ऐसा लगा. आप ऐसा लिख सकते है -

लोग कहते है अमीर हो गया

इश्क में मैं तो फ़कीर हो गया

देखे मे दे की मात्रा  नहीं गिरेगी.    और भी बाते हैं  पर एक  साथ नहीं .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 2, 2015 at 4:49pm

आदरणीय कृष्णा भाई , गज़ल का बहुत सफल प्रयास हुआ है , आपको हार्दिक बधाई । आ. मिथिलेश भाई जी की बात का ख़याल कीजियेगा ॥

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 2, 2015 at 4:27pm
प्रिय कृष्ण मिश्रा जी , बहुत सुन्दर , बधाई , सादर।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 2, 2015 at 4:21pm

मुक्त हृदय से प्रसंशा के लिए धन्यवाद!आ० mahima shree जी!

Comment by MAHIMA SHREE on April 2, 2015 at 4:15pm

वाह... लाजबाव... मजा आ गया बधाई. आपको

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 2, 2015 at 3:59pm

आ० मुझे तो केवल मतले के  उला में बहर के साथ गठजोड़ करना पड़ा है, अस्ल में मतला ये हुआ था--

बलिहारी मै तो,अमीर हो गया

इश्क़ में रब्बा फकीर हो गया

हा में मात्रा गिराना संभव नही दिखा,और दूसरा कुछ रखना मन को भाया नही!

आदरणीय कोई सुझाव हो तो अवश्य दें!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 2, 2015 at 3:36pm

आदरणीय कृष्ण भाई जी बह्र को खूब निभाया है, बधाई 

मिसरों पर बह्र का दबाव महसूस हो रहा है. सादर 

कृपया ध्यान दे...

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