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जो न सोचा था कभी............'जान' गोरखपुरी

२१२२ २१२२ २१२१२

जो न सोचा था कभी,वो भी किया किये

हम सनम तेरे लिये,मर-मर जिया किये

***

तेरी आँखों से पी के आई जवानियाँ

दम निकलता गो रहा पर हम पिया किये

***

आँख हरपल राह तकतीं ही रही सनम..

फर्श पलकों को किये,दिल को दिया किये

***

आदतन हम कुछ किसी से मांग ना सके

और हिस्से जो लगा वो भी दिया किये

***

जख्म को अपने कभी मरहम न मिल सका

गैर के जख्मों को हम तो बस सिया किये

******************************************

मौलिक व् अप्रकाशित (c) ‘जान’ गोरखपुरी

******************************************

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Comment by मिथिलेश वामनकर on April 1, 2015 at 1:54pm
आदरणीय गोपाल नारायण सर, आप जैसे युवा और नए ग़ज़लकार की टिप्पणी पर मुग्ध हो गया हूँ। नमन आपकी लगन को।
आदरणीय कृष्ण भाई अभी रचना पर और समय दिए जाने और सर की सलाह पर अवश्य ध्यान दीजियेगा।
इस प्रस्तुति पर बधाई।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 1, 2015 at 1:31pm

प्रिय मिश्र

आपने  काफिया  अपने माफिक नहीं चुना . आपको 'दिया किये' दो बार लाना पड़ा . वह भी व्याकरण सम्मत नहीं . चौथे शेर में फिर वही

 सके और किये  में लाज्तमा -ए-जुज्ब- ए -रदीफैंन दोष .  यह सब गजल का मजा किरकिरा कर  देता है .  आपकी अगली गजल का इन्तेजार रहेगा. सस्नेह .

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 31, 2015 at 11:28pm
जख्म को अपने कभी मरहम न मिल सका
गैर के जख्मों को हम तो बस सिया किये
बहुत ही खूबसूरत , बधाई , प्रिय कृष्ण मिश्रा जी, सादर।
Comment by Hari Prakash Dubey on March 31, 2015 at 11:17pm

आँख हरपल राह तकतीं ही रही सनम..

फर्श पलकों को किये,दिल को दिया किये....बहूत खूब भाई कृष्ण मिश्र जी ,बड़ा ही गूढ़ शे'र है , बधाई आपको इस सुन्दर रचना पर !

Comment by Sushil Sarna on March 31, 2015 at 8:40pm

जख्म को अपने कभी मरहम न मिल सका
गैर के जख्मों को हम तो बस सिया किये
.... वाह बहुत ही दिलकश ख्यालों की प्रस्तुति है आपकी आदरणीय , हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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