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रिश्तें है बेतार..... (मिथिलेश वामनकर)

22  / 22  / 22  / 22 / 22  /  2

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बादल  जब  बेज़ार  किसी  से  क्या कहना

फिर  कैसी  बौछार किसी  से  क्या कहना

 

ख़ामोशी,  सन्नाटें   किस   की   सुनते  है

बातें  है   बेकार  किसी  से   क्या  कहना

 

बूढ़े  पेड़ों  पर   आखिर   क्या   गुजरी   है

पढ़ लो बस अखबार किसी से क्या कहना

 

रोते   है   वाइज़,    रोने   दो   रस्मों   को

कर लो बस यलगार किसी से क्या  कहना

 

अपनी  छतरी  लेकर    निकलों  राहों   में

बारिश  के आसार  किसी  से क्या  कहना

 

जैसे  तैसे  हम   तो  खुद   को  ढो    लेंगे

काँधें  जो  नाज़ार  किसी से  क्या  कहना

 

दूरी  में     अब   कुर्बत   कैसे      आएगी

रिश्तें  है  बेतार   किसी  से   क्या  कहना

 

आदत   अपनी   जाते - जाते      जाएगी

वो भी है  लाचार किसी से  क्या    कहना

 

महफ़िल  में तनहां  थे  पर  खामोश  रहे  

कब थे हम दरकार किसी से क्या  कहना

 

साहिल से ‘मिथिलेश’ न देखों  लहरों  को

जीवन है मझधार  किसी  से क्या कहना

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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Comment

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Comment by ajay sharma on February 18, 2015 at 10:30pm

bade bhai ......kamal ho gaya ....sadhi , sateek .bebak , pravahyukta rachna , ik ik sher jaise gadha gaya ho .............one of the best of yours ......


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Comment by rajesh kumari on February 18, 2015 at 8:18pm

कमाल ...कमाल ...की ग़ज़ल गाकर देखने में मजा आ गया 

वैसे तो सभी शेर उम्दा हैं कोई कमतर नहीं किनती इनके लिए तो विशेष दाद लीजिये 

जैसे  तैसे  हम   तो  खुद   को  ढो    लेंगे

काँधें  जो  नाज़ार  किसी से  क्या  कहना

 

दूरी  में     अब   कुर्बत   कैसे      आएगी

रिश्तें  है  बेतार   किसी  से   क्या  कहना

 

आदत   अपनी   जाते - जाते      जाएगी

वो भी है  लाचार किसी से  क्या    कहना


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 18, 2015 at 8:09pm

आदरणीय जितेन्द्र पस्टारिया  जी रचना पर सराहना, स्नेह और सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार, हार्दिक धन्यवाद

वाइज़ का प्रयोग मैंने धर्मोपदेशक के अर्थ में किया है. कोई त्रुटी हो तो कृपया मार्गदर्शन प्रदान करने हेतु निवेदन है. सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 18, 2015 at 8:09pm

आदरणीय सोमेश भाई जी आपकी सराहना से मन खुश हुआ और रचना की सार्थकता का संतोष भी. हार्दिक आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 18, 2015 at 8:04pm

आदरणीय खुर्शीद सर, ग़ज़ल पर आपका स्नेह और सराहना पाकर अभिभूत हूँ. आप जैसे ग़ज़लगो, जिनकी ग़ज़लों का नाचीज़ दीवाना है उसे दाद मिल जाए तो बस फिर क्या चाहिए.... जर्रानवाजी के लिए शुक्रिया... 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 18, 2015 at 8:01pm

आदरणीय  Shyam Narain Verma  जी रचना पर सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए आभार. हार्दिक धन्यवाद 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 18, 2015 at 8:00pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव  सर, रचना पर सराहना, स्नेह और सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार, नमन 

Comment by somesh kumar on February 18, 2015 at 7:16pm

मज़ा आ गया |बेहद लयबद्ध और सुंदर अल्फाजों से लबरेज गज़ल |

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 18, 2015 at 6:31pm

बेहद उम्दा गजल कही है आदरणीय मिथिलेश जी. सुंदर मतला और सादगीपूर्ण अशआर पर दिली दाद कुबूल कीजियेगा

तीसरे शेर में 'वाइज' शब्द के अर्थ की प्रतीक्षा रहेगी..  सादर!

Comment by khursheed khairadi on February 18, 2015 at 3:34pm

ख़ामोशी,  सन्नाटें   किस   की   सुनते  है

बातें  है   बेकार  किसी  से   क्या  कहना

 

बूढ़े  पेड़ों  पर   आखिर   क्या   गुजरी   है

पढ़ लो बस अखबार किसी से क्या कहना

दूरी  में     अब   कुर्बत   कैसे      आएगी

रिश्तें  है  बेतार   किसी  से   क्या  कहना

 

आदत   अपनी   जाते - जाते      जाएगी

वो भी है  लाचार किसी से  क्या    कहना

आदरणीय मिथिलेश जी ,मतला ता मक्ता खुबसूरत ग़ज़ल हुई है |सभी अशआर दिल को छूने वाले है|मक्ते में बड़ा गूढ़ दर्शन ,बड़े ही सहज भाव से सुन्दरता के साथ कहा  गया है | भावों की बाढ़ को बड़े सरल तरीके से सुहावनी रिमझिम में बदला गया है |कमाल की रचना हुई है ,बहुत बहुत बधाई |सादर अभिनन्दन | 

 

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