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जीवन का ताना

अकेला उदास डोलता रहा

बाना कहाँ मिला

बुनने को

सच के ताने को

झूठे बानों से

बुनते रहे

एक जख्मी चादर

फरेब के सर पर ओढ़ा

सब्र के कारवाँ चलते रहे

जीने की रिवायत से

समझोता करते रहे

बिन प्यार की

बेरंग चादर ओढ़े

मुखोटों की मुस्कुराहटों का

दम भरते रहे

काश बाना

प्यार की सच्चाई से

खिलता कोई

तो एक सतरंगी चदरिया

बुन लेता

और बस सो जाता चैन से

ओढ़ कर वो

प्यार की सतरंगी चादर

. 

मोहन सेठी 'इंतज़ार'

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 746

Comment

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Comment by vijay nikore on March 25, 2015 at 1:00pm

अति सुन्दर ! बधाई।

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on February 19, 2015 at 3:54am

 somesh kumar जी आभार ...आप ने सही लिखा है "फिर भी अंतिम साँस तक ...बंधन निभाते जाना "

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on February 19, 2015 at 3:53am

 जितेन्द्र पस्टारिया जी बहुत बहुत धन्यवाद ....शुभकामनाएँ 

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on February 19, 2015 at 3:52am

आदरणीया Pari M Shlok जी आभार ....(समझौता ..मुखौटों) को ठीक कर दूंगा अभी इसलिए नहीं कर रहा क्यूंकि ये फिर approval के लिये चली जाएगी ! 

Comment by somesh kumar on February 18, 2015 at 7:39pm

जीवन का ताना बाना 

ना जाना ना पहचाना 

फिर भी अंतिम साँस तक 

बंधन निभाते जाना |

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 18, 2015 at 6:10pm

वाह! बहुत उत्तम रचना रची आपने आदरणीय मोहन जी. बहुत-बहुत बधाई

Comment by Pari M Shlok on February 18, 2015 at 9:46am
ठीक करें समझौता ..मुखौटों ..
बहुत सुन्दर रचना सच झूठ को सुंदरता से प्रस्तुत किया आपने
Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on February 18, 2015 at 6:58am

आदरणीय:..

 Hari Prakash Dubey जी , 

डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी ,

 मिथिलेश वामनकर जी ,

 Sushil Sarna जी 

आप सभी का आभार सराहना के लिये तथा मार्गदर्शन के लिये ...(जल्दी संशोधन कर दूंगा ..मिथिलेश वामनकर जी धन्यवाद बताने के लिये)

Comment by Sushil Sarna on February 17, 2015 at 7:59pm

काश बाना
प्यार की सच्चाई से
खिलता कोई
तो एक सतरंगी चदरिया
बुन लेता
और बस सो जाता चैन से
ओढ़ कर वो
प्यार की सतरंगी चादर

बहुत ही सुंदर प्रवाहमयी रचना बन पड़ी है आदरणीय  Mohan Sethi जी। आदरणीय वामनकर जी की टिप्पणी से सहमत। इस सुंदर प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 17, 2015 at 5:12pm

आदरणीय मोहन जी इस सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई... कुछ टंकण त्रुटियों पर ध्यानाकर्षित करते हुए संशोधन हेतु निवेदन है 

समझोता मुखोटों 

कृपया ध्यान दे...

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