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समझ कर भी ये कुछ समझा नहीं है
ख़ुदा से आदमी डरता नहीं है

हमें हक़ के लिये लड़ना पड़ेगा
ये मौक़ा हाथ मलने का नहीं है

शराफ़त की दुहाई देने वालों
मुक़ाबिल इतना शाइस्ता नहीं है

ये आवाज़ों का जंगल है यहाँ पर
कोई फ़न्कार की सुनता नहीं है

नज़र के सामने रहता है लेकिन
कभी हमने उसे देखा नहीं है

ये दुनिया है संभल कर पाँव रखना
तुम्हारे घर का बाग़ीचा नहीं है

मैं अपनी क़ब्र में लेटा हुवा हूँ
मुझे अब कोई अन्देशा नहीं है

"समर" आँखें बदलती जा रही हें
मिरा सपना अभी टूटा नहीं है

---समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by khursheed khairadi on February 8, 2015 at 6:04pm

ये आवाज़ों का जंगल है यहाँ पर
कोई फ़न्कार की सुनता नहीं है

नज़र के सामने रहता है लेकिन
कभी हमने उसे देखा नहीं है

आदरणीय कबीर साहब , उम्दा ग़ज़ल हुई है |शेर दर शेर दाद कबूल फरमावें |इस शेर पर विशेष दाद ..वाह...

हमें हक़ के लिये लड़ना पड़ेगा
ये मौक़ा हाथ मलने का नहीं है

सादर अभिनन्दन |

Comment by Samar kabeer on February 8, 2015 at 1:22pm
जनाब अरुन कुमार निगम जी,गिरिराज भंडारी जी,सर्वेश कुमार मिश्र जी,हरि प्रकाश दुबे जी,आदाब अर्ज़ करता हूँ,आप सबका तहे दिल से शुक्रिया |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on February 8, 2015 at 10:57am

आदरणीय समर कबीर जी , शानदार गज़ल्के लिये बधाइयाँ........

ये आवाज़ों का जंगल है यहाँ पर
कोई फ़न्कार की सुनता नहीं है

नज़र के सामने रहता है लेकिन
कभी हमने उसे देखा नहीं है.........................इन अश'आरों पर विशेष दाद ...............


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 8, 2015 at 9:41am

लाजवाब !! समर भाई , हार्दिक बधाइयाँ ॥

Comment by सर्वेश कुमार मिश्र on February 8, 2015 at 2:04am

वाकई लाजवाब! बधाई आपको...

Comment by Hari Prakash Dubey on February 7, 2015 at 11:30pm

आदरणीय समर कबीर भाई ,बहुत  ही सुन्दर प्रस्तुति है , दिल से बधाई आपको !

Comment by Samar kabeer on February 7, 2015 at 11:02pm
जनाब अजय शर्मा जी,आदाब,तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ ।
Comment by ajay sharma on February 7, 2015 at 10:50pm

bahut hi khoob gazal hui hai .....ik ik sher jaise dil me utarene wala hai ....

"समर" आँखें बदलती जा रही हें
मिरा सपना अभी टूटा नहीं है   wallah ......

**

Comment by Samar kabeer on February 7, 2015 at 9:56pm
जनाब मिथिलेश वामनकर जी,आदाब,ग़ज़ल पसंद करने के लिये बहुत बहुत शुक्रिया ,आप जैसे अदब नवाज़ जब तक मौजूद हैं,मुझे सुकूत-ए-सुख़न शनासी की शिकायत नहीं होगी |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 7, 2015 at 9:17pm

आदरणीय समर कबीर जी वाह वाह.. सभी अशआर बेहतरीन हुए है दिल से दाद कुबूल फरमाए. मतला बेहतरीन हुआ है और मतले से उम्दा मकते तक सब एक से बढ़कर एक अशआर. ये अशआर तो कमाल के है सीधे दिल में उतर गए -

नज़र के सामने रहता है लेकिन
कभी हमने उसे देखा नहीं है

ये दुनिया है संभल कर पाँव रखना
तुम्हारे घर का बाग़ीचा नहीं है

मैं अपनी क़ब्र में लेटा हुआ हूँ
मुझे अब कोई अन्देशा नहीं है

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