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दीवारें चहकने सी लगे  

मकान जब घर बनता है 
तेरे आने से घर मेरा 
जन्नत बनता है 

खुशियाँ , सावन की 
घटाएँ बनने लगी   
किलकारी से तेरी  
मेरी दुनिया सजने लगी  

खिड़कियाँ घर की 
उम्मीद का सूरज लाए
सुगन्धित मस्त पवन 
गीत बहारों के गुनगुनाएँ

आँगन में फागुन 
रंग नए बिखरा गया 
बसंती खेत की तरह   
मेरे घर को वो लहरा गया
सरसों की फसल सम  
मनभावन सा घर 
पूज्य है मुझको मेरा छोटा सा घर ..

डिम्पल गौर ‘अनन्या’ ३०/१/१५

(मौलिक और अप्रकाशित)

 

 

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Comment

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Comment by Ram Ashery on February 2, 2015 at 2:36pm

अति सुंदर रचना बधाई हो 

Comment by डिम्पल गौड़ on February 1, 2015 at 3:21pm
आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी सादर आभार आपका ..घर में सुख शान्ति निवास करे तब ही कोई घर... सच में घर बनता है ..
Comment by डिम्पल गौड़ on February 1, 2015 at 3:18pm
आदरणीय विनोद खनगवाल जी... रचना पसंद करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद जी
Comment by डिम्पल गौड़ on February 1, 2015 at 3:07pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी  |मेरी रचना की सराहना करने के लिए आपका ह्रदय तल से आभार व्यक्त करती हूँ |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 1, 2015 at 12:29pm

बहुत सुन्दर !! आदरणीया डिम्पल जी , बधाई ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 1, 2015 at 12:21pm

आदरणीया डिम्पल गौर जी ....सुन्दर भाव ....बहुत सुन्दर रचना....हार्दिक बधाई ! सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 1, 2015 at 9:05am

आदरणीया डिम्पल जी खूबसूरत भावों से सजी इस रचना के लिये बधाई स्वीकार करें

Comment by विनोद खनगवाल on January 31, 2015 at 4:31pm
आदरणीया डिम्पल जी। बहुत मनमोहक रचना लिखी है। बहुत बहुत बधाई।
Comment by Shyam Mathpal on January 31, 2015 at 3:04pm

Aadarniya dimple ji,

Makan ,Ghar wa uski khusion ke bare main bhut sundan rachna hai. Dili badhai.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 31, 2015 at 1:25pm

आदरणीया

छोटे से घर की मधुर कल्पना i  सुन्दर i

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