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माँझी ( एक कुण्डलिया छंद) ... डॉ० प्राची सिंह

माँझी मंजिल से पृथक डालो नहीं पड़ाव

भँवर भरे मझधार में क्यों उलझाते नाव?

क्यों उलझाते नाव, लहर पथ कहाँ उकेरे

उथल-पुथल संघर्ष, लाख चौरासी फेरे ,

एकल करो विमर्श! बात करनी क्या साँझी?

क्या होगा परिणाम, राह भटके जो माँझी?

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 19, 2015 at 7:21pm

आदरणीया प्राचीजी इस शानदार रचना पर आपको हार्दिक बधाई सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on January 19, 2015 at 7:06pm

आदरणीया डॉ प्राची सिंह जी , सोच रहां हूँ इतने कम शब्दों में इतनी  सुन्दर प्रस्तुति कैसे लिखी जा सकती है ? बहुत ही सुन्दर रचना , हार्दिक बधाई ! सादर 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 19, 2015 at 6:54pm

बहुत सुंदर और भावपूर्ण कुण्डलिया छंद | जीवन रूपी नैयाँ न भटके, सार रूप में बहुत कुछ समाता छंद रचा है | हार्दिक बधाई आपको 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 19, 2015 at 2:36pm

आ० प्राची जी

चौरासी लाख फेरे से आध्यात्मिक  संकेत देकर आपने न मांझी  मे ईश्वर के दर्शन कराये i उसके विचलन को हम अध्यात्म में ही जीवन की परीक्षा कहते हैं i वह अधिक परीक्षा न ले यानि अधिक न भटके  यह जीव की सहज प्रार्थना है i बहुत अच्छे शब्दों से आपने छंद सिद्ध किया है i आपको बधाई i  सादर i

Comment by Dr. Vijai Shanker on January 19, 2015 at 4:26am
" क्या होगा परिणाम, राह भटके जो माँझी?"
आदरणीय डॉ o प्राची सिंह जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति,
बहुत बहुत बधाई, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 19, 2015 at 12:30am

आदरणीया डॉ प्राची सिंह जी इस रचना को पढ़ते हुए कामायनी याद आ गई ..यथा 

शक्ति के विद्युत् कण जो व्यस्त,विकल बिखरे है हो निरुपाय 

समन्वय उनका करे समस्त, विजयनी मानवता हो जाय.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 19, 2015 at 12:01am

आ० मिथिलेश जी 

छंद का कथ्य आप सम पाठक की स्वीकार्यता पा सका और अभिव्यक्ति को आपकी आत्मीय सराहना मिली.. इससे मुझे भी संतोष हुआ है कि रचना सार्थक हो सकी  है 

आपका हार्दिक आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 18, 2015 at 11:03pm

आदरणीया डॉ प्राची सिंह जी बहुत सुन्दर कुण्डलिया छंद हुआ है. एक एक शब्द जड़ा हुआ. कथ्य इतनी सहजता से उभर आया कि बस हृदय से वाह वाह स्वमेव ही निकलने लगे. हार्दिक बधाई स्वीकार करें 

माँझी मंजिल से पृथक,  डालो नहीं पड़ाव

भँवर भरे मझधार में,  क्यों उलझाते नाव?

क्यों उलझाते नाव, लहर पथ कहाँ उकेरे

उथल-पुथल संघर्ष, लाख चौरासी फेरे ,

एकल करो विमर्श! बात करनी क्या साँझी?

क्या होगा परिणाम, राह भटके जो माँझी?

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