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दिये की बाती मैं
धुए में घिर जाती हूं
कुछ पल को घबराती
तो कुछ पल इठलाती हूँ
चीर तिमिर की छाती मैं
भू को ज्योतिर्मय कर जाती हूँ
अनिल तूफानी तेज हुए
भावुक मन और उत्तेजित हुए
ज्योति शिखर पे नर्तन करती
लिपट दिये के अंतस में
क्षण भर को शर्माती
और सहज धीर बढ़ाती हूँ
राग अनोखे गाती मैं
रागिनी को अपना पाती हूँ
आह समेटे... चाह लिए
क्षणभंगुर आतुर जीवन में
खाक हुई... पीर छिपाई
ज़र्रे ज़र्रे को रोशन करती
अपलक रास रचाती हूँ
दिये की बाती मैं ..
धुए में घिर जाती हूँ
निपट अकेली निडर कभी
उज्ज्वलित निशा को करके….
दिये में ही खो जाती हूँ
@आनंद ११/०१/२०१५  "मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by JAWAHAR LAL SINGH on January 14, 2015 at 8:30pm

खूबसूरत भाव के साथ कविता अच्छी हुई है आनंद जी!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 14, 2015 at 12:59pm

आदरणीय आनंद भाई , खूबसूरत  कविता के लिये बधाई ॥

Comment by Hari Prakash Dubey on January 14, 2015 at 12:58pm

क्षणभंगुर आतुर जीवन में 
खाक हुई... पीर छिपाई 
ज़र्रे ज़र्रे को रोशन करती 
अपलक रास रचाती हूँ ........खूबसूरत रचना ,आदरणीय आन्नद मूर्ति जी सुन्दर कविता। हार्दिक बधाई इस प्रस्तुति के लिए।

Comment by khursheed khairadi on January 14, 2015 at 11:59am

आदरणीय आन्नद मूर्ति साहब , सुन्दर कविता है |बधाई स्वीकार करें |सादर अभिनन्दन |

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 14, 2015 at 11:42am

आदरणीय भाई  आनंद जी, इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई l

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 14, 2015 at 11:39am

चीर तिमिर की छाती मैं
भू को ज्योतिर्मय कर जाती हूँ
अनिल तूफानी तेज हुए
भावुक मन और उत्तेजित हुए
ज्योति शिखर पे नर्तन करती
लिपट दिये के अंतस में
क्षण भर को शर्माती
और सहज धीर बढ़ाती हूँ-----------------------सुन्दर भाव i

Comment by Shyam Narain Verma on January 14, 2015 at 11:01am

बहुत  ही सुन्दर प्रस्तुति  //हार्दिक बधाई आपको 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 14, 2015 at 10:54am
आदरणीय आनंद जी सुन्दर कविता। हार्दिक बधाई इस प्रस्तुति के लिए।

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