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अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं (गीत) // -- सौरभ

१२१२ ११२२ १२१२ २२

सहज लगाव हृदय में हिलोड़ जाते हैं ।
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं ॥

किसी उदास की पीड़ा सजल हृदय में ले
निशा निराश हुई, चुप वृथा पड़ी-सी थी
तथा निग़ाह कहीं दूर व्योम में उलझी
किसी करीब के होने की आस जीती थी

मगर रुकी है कहाँ ज़िन्दग़ी किसी पल भी
इसी विचार को समवेत स्वर में गाते हैं--
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं !!

उतावली कोई अल्हड़ झिंझोर दे मणियाँ
कभी लगे कि झरे पारिजात अदबद कर
रसालकुंज अघाया हुआ.. मताया-सा..
कुमारियों की नरम देह झुक गयी लद कर

शकुंतला है इन्हीं वृक्ष, वन-लताओं में  
पुलक-पुकार से दुष्यंत फिर बुलाते हैं !
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं !!
 
धरा के अंग पे सुन्दर लगें ये आभूषण
कभी  सुहाग  के  कुंकुम बने निखरते हैं
महावरों की लकीरों-से रच गये, या फिर-  
सुहाग-रंग छुए अंग बन-सँवरते हैं

लगे धरा ये सिहरती हुई नयी दुल्हन
’अटल रहे तेरा अहिवात..’ बोल भाते हैं !
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं !!
******************
-सौरभ
(मौलिक और अप्रकाशित)

Views: 953

Comment

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 22, 2014 at 11:59am
उतावली कोई अल्हड़ झिंझोर दे मणियाँ
कभी लगे कि झरे पारिजात अदबद कर
रसालकुंज अघाया हुआ.. मताया-सा..
कुमारियों की नरम देह झुक गयी लद कर

शकुंतला है इन्हीं वृक्ष, वन-लताओं में
पुलक-पुकार से दुष्यंत फिर बुलाते हैं !
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं !!
माननीय
शृंगार वर्णनं तो बहुत पढ़े i पर ऐसा अद्भुत अकल्पनीय वर्णन कहाँ मिलता है i मानो साक्षात् शृंगार ही मूर्त्त हो गया हो i आपकी कलम की महारत है यह i सादर i
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 22, 2014 at 10:22am

आस ,उदासी, सौंदर्य, श्रृंगार , सुहाग , अभिसार सबकुछ लपेटे  दीपों की लड़ियों सी पंक्तियाँ  , बहुत सुन्दर, धन बिखेरती दीवाली का चित्रण , बधाई आदरणीय सौरभ पण्डे जी. दीपाली की शुभकामनाएं 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 22, 2014 at 9:35am

भाई जितेन्द्रजी,  आपको दीपावली की अनेकानेक शुभकामनाएँ.

रचना को अनुमोदित करने के लिए हार्दिक धन्यवाद.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 22, 2014 at 9:34am

आदरणीया राजेश कुमारीजी, दीपावली के अवसर पर लिखा गया गीत तनिक विशेष आयाम लिए हुए है. आपको इस गीत का विन्यास रुचिकर लगा, समझिये प्रयास सार्थक हुआ. हार्दिक धन्यवाद..

दीपावली की अनेकानेक शुभकामनाएँ.

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 22, 2014 at 9:32am

आदरणीय श्याम नारायणजी, रनाओं पर आपकी उपस्थिति उत्साहित करती है..

दीपावली की अनेकानेक शुभकामनाएँ.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 22, 2014 at 9:31am

गीत को पसंद करने के लिए हार्दिक धन्यवाद, भाई नीरज नीर जी.

दीपावली की अनेकानेक शुभकामनाएँ.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 21, 2014 at 11:17pm

बहुत सुंदर .दीपावली पर झिलमिलाती सुंदर दीपमालाओं सा मनभावन गीत, ह्रदय से बधाइयाँ आपको आदरणीय सौरभ जी. दीपोत्सव की ढेरों शुभकामनाएं


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 21, 2014 at 9:08pm

उतावली कोई अल्हड़ झिंझोर दे मणियाँ 
कभी लगे कि झरे पारिजात अदबद कर 
रसालकुंज अघाया हुआ.. मताया-सा.. 
कुमारियों की नरम देह झुक गयी लद कर 

शकुंतला है इन्हीं वृक्ष, वन-लताओं में  
पुलक-पुकार से दुष्यंत फिर बुलाते हैं !
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं !!--वाह्ह्ह वह्ह्ह.... आज तो अभिज्ञान शाकुन्तलम की याद आ गई.

कितनी ख़ूबसूरती से  इक द्रश्य सा आँखों के सामने अवतरित कर दिया आपने ...दीपावली के अवसर को सार्थक करता बहुत ही खूबसूरत गीत लिखा गया है आपकी समर्थ लेखनी से आ० सौरभ जी. ढेर सारी बधाईयाँ गीत के लिए भी दीपावली के लिए भी |
 

Comment by Shyam Narain Verma on October 21, 2014 at 1:14pm

बहुत सुन्दर मनमुग्ध करता गीत ...बहुत बहुत बधाई आपको.............

सादर..................

Comment by Neeraj Neer on October 21, 2014 at 9:22am

बहुत उत्कृष्ट ... अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं... बहुत सुंदर गीत ... 

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