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वो घर ग़मज़दा था
ग़म का मैक़दा था

कुछ चिंगारियां थी
बाकी तो धुंआ था

हवा की सरसराहट
अजब सन्नाटा था

दरो दीवार सीली थी
वो रात भर रोया था

शक इक वज़ह थी
घर बिखर गया था
.
मुकेश इलाहाबादी ---

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by MUKESH SRIVASTAVA on July 23, 2014 at 4:17pm

jee - shukria Saurabh Pandey jee - Giriraj jee kee baat dhyaan me hai - shukiraa


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 21, 2014 at 10:53pm

आदरणीय गिरिराज भाई ने मतले में काफ़िया को लेकर इंगित किया है. उसे आप देख लेंगे, आदरणीय मुकेशभाईजी.

ग़ज़ल के अश’आर अच्छी कहन के साथ प्रभावित करते हैं. शुभ-शुभ

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on July 17, 2014 at 11:17pm

AADARNEEYA MANJARI JEE AUR GIRIRAJ JEE - GAZAL PASANDGEE KE LIYE BAHUT BAHUTA AABHAAR - GIRIRAAJ JEE AAPKEE SALAAHIYAT KE LIYE BAHUT BAHUT SHUKRIAA KOSHISH RAHEGEE KEE MTLAA DURUST KAR SAKOON - AADAR SAHIT - MUKESH

Comment by mrs manjari pandey on July 17, 2014 at 8:02pm
आदरणीय मुकेश जी छोटी बहार की बेहतरीन ग़ज़ल। इसके लिए बधाई आपको

वो घर ग़मज़दा था
ग़म का मैक़दा था

कुछ चिंगारियां थी
बाकी तो धुंआ था

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 16, 2014 at 12:52pm

आदरणीय मुकेश भाई , बहुत सुन्दर भाव और विचार पिरोये हैं आपके अपनी रचना में , आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

आदरणीय , मतले मे काफिया जो आपने लिया है उसे बाक़ी अशआर मे नही निभा पाये हैं , मतला सुधार कर , - काफिया मे आप पूरी गज़ल को ला सकते हैं ॥

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on July 16, 2014 at 12:06pm

bahut bahut aabhaar Dr.Gopal Narayan Srivastava jee aur Laxman Dhami jee - is hauslaa aafzaee ke liye

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 16, 2014 at 11:34am

आ0 भाई मुकेश जी छोटी बहर की एक सुन्दर सी गजल कहने के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 14, 2014 at 3:26pm

शक इक वज़ह थी
घर बिखर गया था------- बहुत खूब i बहुत से घर महज शक से बर्बाद हुए हैं i

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