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सांत्वना (लघु कहानी)-लक्ष्मण लडीवाला

पत्नी की म्रत्यु के २ वर्ष बाद ही बीमार रहने लगे मथुरा के संभ्रांत और संपन्न परिवारके श्री काशी प्रसाद जी का

८५ वर्ष की उम्र में देहांत हो गया | रात को शौक जताने आयेरिश्तेदार दुःख की घडी में सांत्वनाजता रहे थे, तभी

उस परिवार की बहुएँ खिलखिलाती हुईआई और सीधे बैठक के ऊपर वाले कमरे में चली गयी | बड़े बेटे ने झेपते

हुए बताया की येकिरायेदार का परिवार है | उसी समय नौकर आकर बोला“साहब जी, होटल से सब खाना खाकर

लौट आये है, और आपके लिए खाना पेक कराकर लाये है जल्दी आ जाना वर्ना खाना ठंडा हो जाएगा | सांत्वना

देने आये सभी रिश्तेदारों ने यह कहते हुए विदाई ली“प्रभु मृतक की आत्मा को शान्ति प्रदान करे”

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Shubhranshu Pandey on July 2, 2014 at 9:27pm

सुन्दर कथा अदरणीय,

कई भावों को समेट कर कथा ने मन मोह लिया..काशी प्रसाद जी का पत्नी के देहावसान के दो साल के बाद ही जाना...बडे़ बेटे का अपनी बहुओं के व्यवहार पर लीपा पोती... और बहुओं का अपने बुजुर्ग के प्रति व्यवहार..अपनी पूर्ण आयु के बाद शायद काशी प्रसाद जी की आत्मा आशीर्वाद ही दे रही होगी.....

सादर.

Comment by savitamishra on July 2, 2014 at 9:14pm

संवेदनाये ख़त्म हो गयी है जीते जी रिश्ते मर रहे है तो मरने पर भला कौन निभाए ..मार्मिक कथा 

Comment by Priyanka singh on July 2, 2014 at 4:54pm

यही है आज का सच ....रिश्ते तब तक जब वो जीवित हो और उपयोगी हो वरना ....सब औपचारिकताएँ है बस .... इस अच्छी लघु कथा के लिए ....बधाई सर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 2, 2014 at 4:38pm

बहुत मार्मिक ...संवेदनाएं ही मर चुकी हैं बच्चे सब समझते भी हैं इसी लिए बड़े बेटे ने बात को छुपाने की कोशिश भी की, लोक लिहाज भी है...फिर भी ....यही तो हो रहा है शोक सभाएं भी मात्र औपचारिकता भर रह गई हैं ,बहुत बढ़िया लघु कथा लिखी आपने आ० लक्ष्मण जी बहुत-बहुत बधाई|

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 2, 2014 at 2:45pm

लडीवाला जी / क्या बात है / संवेदना का इतना क्षरण / आपने  सच पर से पर्दा उठाया / बधाई हो i

Comment by बृजेश नीरज on July 2, 2014 at 2:43pm
अच्छी लघुकथा है। आपको बहुत बधाई।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 2, 2014 at 11:33am

यही तो आज का सच है, जाने वाला गया. किसी को क्या फर्क पड़ता है बस एक फोटो फ्रेम में लग जायेगी और कभी-कभी उस पर से धुल साफ कर दी जाएगी. बहुत मार्मिक रचना आपने साझा की आदरणीय लक्ष्मण जी

Comment by Sushil Sarna on July 2, 2014 at 11:14am

एक कड़वी और दिल को चुभने वाली परिस्थिति को दर्शाती इस लघु कथा के लिए हार्दिक बधाई। 

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